Article: Guru Puja

"जै माता दी"
प्रातः स्मरणीय श्री श्री स्वामी जी महाराज जी के चरणों में मेरा शत-शत प्रणाम, परम पूजनीय श्री मां जी के चरणों में मेरा प्रणाम।
मैं जब ८-१० साल की थी तो मुझे अपनी माता जी के साथ मन्दिर में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, मेरी माता जी ने मुझे श्री मां जी से मिलवाया और कहा कि यह तेरे मासी जी हैं लेकिन मुझे महसूस हुआ कि यह तो मेरे भगवान हैं मेरे गुरू हैं श्री मां जी ने मन्दिर में बाल-गोपाल आध्यात्मिक शिक्षा केन्द्र नामक स्कूल चलाया था। यहां पर हर रविबार को गांब और शहर से वच्चे आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे। इस स्कूल में श्री मां जी सब बच्चों को श्री राम कृष्ण, परमहंस जी, शारदा मां जी और स्वामी बिवेकानन्द तथा अनेक महापुरूषों और सन्तों के बारे में बताते थे। श्री मां जी के आशीर्वाद से ही हम सब बच्चों ने ५१००० राम नाम की गोलियां भी व्यास नदी में प्रवाहित की। श्री मां जी के सान्निध्य में आकर ही मुझे स्वामी जी के दर्शन मिले। स्वामी जी बच्चों से बहुत प्यार करते थे मुझे भी उनके चरणों में रहने का सौभाग्य मिला। स्वामी जी को इडली और खिचड़ी बनाने का बड़ा शौक था। स्वामी जी महाराज हम सब लोगों को इतने प्यार से बनाकर खिलाते थे मानो ऐसा लगता था कि कोई माঁ अपने बच्चे को खिला रही हो। स्वामी जी मन्दिर में आने जाने वाले सभी या‍‍‍त्रियों की सेवा करते थे। वे कहते थे निष्काम भाव से की गई सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है वे प्यासों को पानी पिलाते भूखों को खाना खिलाते इसी में उनको बड़ा आनन्द मिलता था। स्वामी जी आत्मा परमात्मा को एक समझते थे। वे प्तयेक जीव में भगवान के दर्शन करते थे। मैं छोटी थी लेकिन फिर भी मुझे यह बातें अच्छी लगती थी। स्वामी जी हर नारी में मां का रूप देखते थे वे कहते थे कि नारी मां होने के साथ शक्ति भी है। इसी नारी शक्ति को उजागर करने के लिए उन्होंने मन्दिर में शारदा मां सेवा संघ की स्थापना की। आज देश-विदेश में इस संघ का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है। समय बीतता गया मैं इसी तरह मन्दिर आती जाती रही लेकिन एक दिन ऐसा आया कि स्वामी जी साकार रूप से निराकार रूप में समा गये। इसके पश्चात मैं श्री मां जी में ही स्वामी जी को देखने लगी। और श्री मां जी ने मुझे अपने आंचल में समेट लिया। समय बीतने के साथ-साथ सन १९९४ में मेरी शादी जोगिन्द्रनगर में श्री मनोहर सूद जी के साथ हुई मैं घर गृहस्थी में इतनी व्यस्त हो गई कि मन्दिर कम ही आ जा पाती थी। श्री मां जी का ननिहाल और मेरा ससुराल साथ में ही है । मां जी कभी कभी अपने ननिहाल आते थे तो मैं और मेरे पतिदेव मां जी के दर्शनों के लिए जाते थे। तो मेरे पतिदेव मां जी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उनकी लगन श्री मां जी के चरणों से लग गई। मेरा मन करता था कि मैं भी मां जी को अपने घर में बुलाऊं लेकिन ससुराल में नई थी इसिलिए डरती थी। लेकिन अपने बच्चों की बात मां के मन से कैसे छुपी रह सकती है। उन्हौंने हमारे मन की बात भांप ली और इतनी कृपा की कि सन २००० में 'मातृ छाया' गृह बन कर तैयार हो गया। सन २००० अप्रैल में ही मां जी इस गृह में आई और शारदा मां सेवा संघ की स्थापना की । महिने के एक रविबार को यहां पर सत्संग किया जाता है। समय बीतने के साथ साथ मेरे पतिदेव भी दिल से मन्दिर से जुड़ते चले गए। मुझ पर स्वामी जी की यह बड़ी कृपा है मैं तो बचपन से जुड़ी थी अगर मेरे पतिदेव की लग्न न लगती तो मैं क्या करती? स्वामी की कृपा बढ़ती गई और मैं मेरे पतिदेव , मेरे बच्चे मुदित, मानित हम सब पहले से ज्यादा मन्दिर जाने लगे। श्री मां जी साल में दो बार "मातृ छाया" गृह में आती हैं और सत्संग होता है। स्वामी जी महाराज जी के आशिर्वाद से श्री मां जी के साथ हमने चार धाम सम्पूर्ण किए। बचपन में मैंने अपने बुजुर्गों से सुना था कि आदमी जब बृद हो जाता है तो चार धाम करता है। लेकिन स्वामी जी की लीला बहुत निराली है उन्हौंने हम बच्चों पर छोटी उम्र में कृपा कर दी। कहते हैं भगवान भी मानुष तन पाने के लिए और धरती पर आने के लिए तरसते हैं। लेकिन हम लोगों ने मानव देह भी प्राप्त कर ली है। और श्री महादेवी तीर्थ में श्री स्वामी जी महाराज के चरणों और श्री मां जी के चरणों में रहकर स्वर्ग प्राप्त कर लिया है। जब-जब मुझे दुःख का ऐहसास हुआ है, तब तब स्वामी जी ने मेरा दुःख दूर किया है। मेरी जिन्दगी में जो अनुभव हुए हैं उन्हैं मैं यहां लिखना चाहुंगी। कि किस प्रकार भगवान अपने बच्चों पर कृपा करते हैं। हमारे यहां ऐसी धारणा है जब घर में किसी का जन्मदिन आता है तो उससे एक दिन पहले पण्डित जी को टीप दिखाई जाती है, ताकि ग्रहों का पता लग सके मेरे पतिदेव जी का जन्मदिन आया मैं और मेर पतिदेव पण्डित जी के पास टीप दिखाने गए। पण्डित जी ने जैसे ही उनकी टीप देखी तो उनका चेहरा पीला पड़ गया। मैंने पूछा क्या बात है। तो पण्डित जी कहने लगे कि ग्रहों के हिसाब से तो लाला जी ने पागल हो जाना था, गाड़ियों के पीछे भागना था, पेड़ों के पते गिनने थे। यह तो आपके ऊपर कोई भगवान का आशिर्वाद है जो लाला जी बच गए हैं। मैं तो यह सुनकर दंग रह गई और रोने लगी। पण्डित जी कहने लगे कि मैंने अपनी उम्र में दो टीप ऐसी देखी जिनको इतनी ग्रहदशा चली है और उनको पता ही नहीं है। मेरे पतिदेव कहने लगे कि यह सब स्वामी जी की ही कृपा है, जिन्हौंने हमें कष्ट से बचाया है।
मैं श्री श्री महाराज जी से यही प्रार्थना करती हूं कि हम सब को सुख शान्ति दे और सदबुद्धी दें। ताकि हम स्वामी जी के बताए हुए आदर्शों पर चल सके और उनका पालन कर सके। अन्त में मैं श्री श्री स्वामी महाराज जी और श्री मां जी से यही दुआ करती हूं कि वे हमें हमेशा अपने चरणों में जगह दें और आशीर्वाद की वर्षा करते रहें।
सुमन सूद
जोगिन्द्रनगर
मण्डी हि०प्र०

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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