An Introduction

जय जय श्री महाराज जी
प्रथम मंगल चरणः-
तव कथामृतम् तप्त जीवनमम्
कवि भिरीडितम कल्मषापहम्
श्रवण मंगल श्री मदातत
भुवि गृणान्ति ये भूरिदा जनाः
प्रभो, तुम्हारी लीला कथा अमृतस्वरूप है। ताप-तप्त जीवों के लिए तो वह जीवन स्वरूप है। ज्ञानी महात्माओं ने उसका गुणगान किया है। वह पाप पुंज को हरने वाली है। उसके श्रवण मात्र से परम् कल्याण होता है। वह परम् मधुर तथा सुविस्तृत है। जो तुम्हारी इस प्रकार की लीला कथा का गान करते हैं, वास्तव में इस भूतल में वे ही सर्वश्रेष्ठ दाता हैं। (श्री मद भागवत, 10/31/9)
प्राक्कथन
महादेवी तीर्थ जो कुल्लू में न केवल श्रद्धालुओं के लिए अपितु पर्यटकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल बन गया है, श्री महाराज सेवकदास जी की ही देन है। इस परम विभुति का इस देवभूमि में आगमन दो प्रयोजनों से हुआ था। एक था श्री मां की खोज और दूसरा "मां" के निर्देश से इस स्थान की खोज एवं प्राकटय। श्री महाराज के संसर्ग में यूं तो अनेक भक्त रहे परन्तु उनका सान्निध्य श्री मां से अधिक किसी अन्य को नहीं मिला। श्री मां ने उन्हैं गुरू और भगवान की तरह पूजा, उन्हैं मां का वात्सल्य दिया और निकटतम सहयोगी का सहयोग दिया। इस दृष्टि से वे हि उन्हैं निकटतम रूप में देख एवं जान पाई। इस घाटी में श्री महाराज की लीलाओं के संस्मरण जो श्री मां ने यत्र-तत्र लिख रखे थे एकत्रित कर पुस्तक का रूप दिया गया है, जिससे श्रद्धालुओं को श्री महाराज के २५ वर्षों के जीवन, उनके कार्य एवं शिक्षा व आदर्शों की जानकारी मिल सके और अधिक से अधिक लोग उनकी शिक्षाओं एवं आदर्शों का अनुसरण कर त्रिविध- ताप से शान्ति पा सकें। आशा है जन-जन को त्रिविध-ताप से मुक्ति दिलाने का जो निर्देश श्री महाराज को वैष्णु देवी (जम्मू) में 'मां' से मिला था यह संकलन उसकी पूर्ति में सहायक सिद्ध होगा। (मास्टर)
आर्शीवाद
वैष्णू देवी के बाबा श्री महाराज सेवक दास के संस्मरण का द्वितीय संस्करण भक्तों की सेवा में प्रस्तुत है। सन्तों की महिमा वखान करना तो बहुत कठिन है परन्तु जो कुछ भी भक्तों के ज्ञान में था, इस पुस्तक में देने का प्रयत्न किया गया है।
सन्त प्रेम के अवतार होते हैं। करूणा के सागर होते हैं। सर्वत्यागी होते हैं सन्त काम को विशुद्ध प्रेम में बदल देते हैं। क्रोध को करूणा का रूप देते हैं। मोह को भक्ति में परिवर्तित कर देते हैं। लोभ को दान तथा त्याग में परिणत करते हैं तथा अहंकार? अहंकार तो उनमें रहता ही नहीं। अहंकार तो सेवा में बदल जाता है। मानव मात्र की सेवा में, दीन दुःखी की सेवा में। सेवा ही मुख्य लक्ष्ण हो जाता है संत का।
स्वामी जी ऐसे ही सन्त थे। उन की लीलाओं का वर्णन यथा सम्भव इस पुस्तक में किया है। परन्तु सन्तों की लीलाओं का सम्पूर्ण वर्णन हो ही नहीं सकता।
हमारी मनोकामना है कि भक्तजन उनकी जीवन लीला को समझ कर अपने जीवन को सफल बनाएं। हमारा आर्शीवाद तथा शुभकामनाएं सदा आप के साथ हैं।
श्री 'मां'
महादेवी तीर्थ कुल्लू

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 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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