Article: Guru Puja

राष्ट्रीय एकता का तात्पर्य है- राष्ट्र के सब घटकों में भिन्न- भिन्न विचारों और विभिन्न आस्थाओं के होते हुए भी आपसी प्रेम एकता और भाईचारे का बना रहना। राष्ट्रीय एकता में केवल शारीरिक, समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक, बौद्धिक, वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता आवश्यक है। एकता का अर्थ यह नहीं होता कि किसी विषय पर मतभेद ही न हो। मतभेद होने के बावजूद भी जो सुखद और सर्वहितकारी है उसे एक रूप में सभी स्वीकार कर लेते हैं। राष्टीय एकता से अभिप्राय है सभी नागरिक राष्ट् प्रेम से ओत-प्रोत हों सभी नागरिक पहले भारतीय हों, फिर हिन्दू या मुसलमान। राष्ट्रीय एकता का भाव देश रूपी भवन में सीमेंट का काम करता है।
एकता का सबसे बड़ा उदाहरण हमारा शरीर है। हमारे शरीर में लाखों छोटी- छोटी कोशिकाएं मिलकर उत्तकों का निर्माण करती हैं उत्तक मिलकर अंग बनाते हैं अंग मिलकर शरीर की रचना करते हैं। शरीर में हाथ सबसे अधिक कार्य करता है लेकिन हाथ कभी यह नहीं कहता उसे ही सबसे अधिक ऊर्जा मिलनी चाहिए। मुख विवेक सहित समस्त अंगो का एक समान पालन पोषण करता है।
धर्म शब्द धृ धातु से बना है जिस का अर्थ है। एक साथ रखना अर्थात धर्म एकत्व स्थापित करता है धर्म हमें परस्पर मिलाकर रखता है, जो राष्ट्रीय धर्म राष्ट्रीय एकता में बाधक है वह धर्म नहीं। संसार में हम अग्नि और जल आदि को ले लें इन सब के अपने अपने धर्म हैं। जल का धर्म शीतलता है। अग्नि का धर्म दहकना है और पवन का धर्म गति है। ये इन पदार्थों की प्रकृति व स्वभाव है। सृष्टि के सम्पूर्ण पदार्थ एक ही धर्म रखते हैं। अतः हमारा राष्ट्रीय धर्म भी एक होना चाहिए। दूसरों का हित सोचना, दूसरों का भला करना इससे बड़ा धर्म और कोई नहीं। वास्तव में यदि देखा जाए तो राष्ट्रीय एकता व धर्म दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं न कि पृथक जिस धरती पर हमने जन्म लिया जिसने हमारा पालन पोषण किया उसके प्रति हमारा कर्तव्य है इस पवित्र भूमि की रक्षा के लिए एकता के लिए हर समय तत्पर रहें। एक बार एक राहगीर जा रहा था तो उसने देखा एक बृक्ष को आग लगी हुई है सभी पक्षी बृक्ष पर ही बैठे हुए हैं। वहां से उड़ने का प्रयास भी नहीं कर रहे थे, उस राहगीर ने पक्षियों से प्रशन किया--"आग लगी इस पेड़ को जलने लगे सब पात तुम पक्षी क्यों मरत हो जब पंख तुम्हारे पास। पक्षियों ने उत्तर दिया-- फल खाए इस वृक्ष के, गंदे कीने पात, यही हमारा धर्म है, जलें इसी के साथ। पक्षी अपने धर्म के प्रति सजग हैं तो हम सब का यही धर्म है राष्ट्रिय एकता को खण्डित करने बालों के प्रति एक जुट हो जाएं, चाहे यह अराजकतावादी तत्व आन्तरिक हों या बाह्य।
सभी धर्म अपने आरम्भ में मानव कल्याण और राष्ट्रीय एकता को महत्व देते हैं धीरे धीरे यह धर्म निजी स्वार्थों के घेरे में घिरने लगा, तथाकथित धर्माचार्यों ने इसे अपनी सुविधा के अनुसार प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। धर्म अपने विकृत रूप में अनेक रूढ़ियों और अन्धविश्वासों से जकड़ने लगा और इसमें साम्प्रदायिकता व जातिवाद की घुसपैठ हौने लगी। इस घुसपैठ ने राष्ट्रीय धर्म के वास्तविक स्वरूप का गला घोंट डाला। धर्म जिस राष्ट्रीय एकता की सुदृढ़ नींव पर खड़ा हुआ था चरमराने लगी। सभी व्यक्ति धर्म की दुहाई तो देते हैं पर बहुत कम लोग ऐसे हैं जो धर्म के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं। धर्म मैं त्याग की महता है। धर्म अपने विस्तृत रूप में राष्ट्रीय धर्म बन जाता है और इससे ऊपर मानव धर्म । त्याग और कर्तव्य परायणता में ही धर्म का वास्तविक स्वरूप नीहित है। त्याग परिवार के लिए ग्राम के लिए नगर के लिए और राष्ट्र के लिए भी हो सकता है। त्याग परिवार से घर घर से राष्ट्रीय एकता की विशाल परिधी में घूमने लगता है यही वह क्षेत्र है जहां जाती की संकीर्ण दिवारें गिरकर चूर- चूर हो जाती हैं। मनुष्य पूरे राष्ट्र को अपना समझने लगता है अपने आप को परिवार की तरह राष्ट्र का सदस्य।राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने वालों को मुंह तोड़ जवाब देता है चाहे वह १९६५, १९७१ का युद्ध हो या कारगिल में घुसपैठ। राष्ट्रीय एकता को खण्डित करने वालों को दण्ड देने के लिए धर्म की दीवारें आड़े नहीं आती उस समय उसका एक ही धर्म होता है- राष्ट्रीय धर्म फिर वह पुकार उठता है।
अखण्ड देश की है अखणड परम्परा।
हमें सदा रही प्राणों से प्रिय धरा।
इस प्रकार निष्कर्ष यही निकलता है धर्म अपनी सीमा में रहकर परिवार, समाज और राष्ट्र कल्याण के लिए सीमित रहे। राष्ट्रीय धर्म, जाति-पाति के बन्धनों को तोड़कर मानव मात्र के कल्याण की परिकल्पना करने लगता है। देश की एकता को बनाए रखने के लिए देश को सबल बनाने के लिए साम्प्रदायिक सद्दभाव और सौहार्द्ध की आवश्यकता है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए प्रेम से प्रेम घृणा से घृणा उत्पन्न होती है। घृणा और अहिंसा सभी बुराईयों की जढ़ है। सभी धर्म, सत्य, प्रेम, सदाचार व एकता का पाठ पढ़ाते हैं। हमारे संबिधान में धर्म निरपेक्ष समाजवादी समाज की परिकल्पना की गई है। इस सबसे सर्बोपरी है राष्ट्रीय धर्म। हम सभी देश की प्रगति व सुख शान्ति की कामना तभी कर सकते हैं यदि हम अपने कार्य के प्रति, उत्तरदायित्व के प्रति सतर्क और सचेत रहें। एक राष्ट्र की प्रगति, सुख और शान्ति तब तक सम्भव ही नहीं जब तक राष्ट्र रूपी शरीर के सभी अंश परस्पर समायोजन नहीं करते हैं। यही राष्ट्रीय धर्म है कि हम अनेक जाति धर्म और सम्प्रदाय के कीचड़ में न धंसे अपितु एक ही धर्म एक ही सम्प्रदाय को स्वीकार करें वह धर्म अथवा सम्प्रदाय हो 'राष्ट्रीयता' हम सबका राष्ट्रीय एकता का प्रतिबिम्ब भारत रूपी विशाल मन्दिर है हम सभी नागरिकों का। राष्ट्र की एकता के लिए राष्ट्र की प्रगति के लिए और जातीय सौहार्द के लिए राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की ये काव्य पंक्तियां हमारा राष्ट्रीय धर्म होना चाहिए-
आओ, मिलें सब देश बान्धव हार बनकर देश के,
साधक बनें सब प्रेम से सुख शान्तिमय उद्देश्य के।
क्या साम्प्रदायिक भेद से ऐक्य मिट सकता अहो,
बनती नहीं क्या एक माला विविध सुमनों की कहो।
प्रस्तुति लेखिका
अविनाश भण्डारी
सवित शर्मा होशियारपुर होशियारपुर

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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