Article: Guru Puja

OM
हमारे अराध्य श्री गुरूदेव जी महाराज कर्मयोगी और एक सच्चे सन्त थे। मेरे पतिदेव शादी से पहले ही उनके साथ जुड़े हुए थे और मेरा यह सौभाग्य ही था कोई पिछले पूर्व जन्म का अच्छा कर्म होगा जो शादी के वाद श्री महाराज जी के सान्निध्य में रहने का सुअवसर मिला। श्री महाराज जी हमारे लिए भगवान तो थे ही लेकिन एक पिता तुल्य और सखा ज्यादा थे। गुरू शिश्य की परिभाषा को समझ पाना हमारी समझ से परे था और इस बारे इतना ज्ञान भी नहीं था उनकी आज्ञा को शिरोधारय करना और उनके श्री चरणों में सिर झुकाना, बस इतना ही तो हमारे बस की बात थी। घर-गृहस्थी में कैसी भी खुशी की बात हो या परेशानी की उनके सम्मुख रखने रखने पर एक अलग सा सकून मिलता था। दुःख की कई ऐसी अनसुलझी स्मस्याएं आती थी जो न बताने पर भी बातचीत में ही समाधान बता कर मानसिक पीड़ा को दूर कर देते थे। यह सारा श्रेय श्री मांजी को ही जाता है क्योंकि वह हमेशा ही हमारी पथ प्रदर्शक बनीं रही और आज भी उनका आशीर्वाद हमारे ऊपर बिराजमान है। पूजनीय श्री महाराज जी के साथ बिताए हुए स्वर्णिम क्षण और उनके मुखारबिन्द से कही हुई पवित्र वाणियां तो बहुत हैं जिन्हैं ब्यान करने की हमारी योग्यता नहीं हैं। फिर भी एक घटना को लिखने की कोशिश कर रही हूं।
सन १९८४ की बात है जब मेरे पति देव सरकारी कार्यालय में कार्यरत थे श्री महाराज के आशिर्वाद से उनकी प्रमोशन हुई और हम लोग बहुत खुश थे लेकिन कुछ तकनीकि बजह से जितने भी अधिकारी प्रमोटिड थे उन सभी को पहले वाली पोस्ट पर वापिस के आर्डर कर दिये थे। इसी दौरान मेरे पतिदेव पूजनीय श्री महाराज जी के दर्शन करने मन्दिर गए व उनसे सारे हालात का वर्णन भी किया यह भरे हुए मन से महाराज जी को कहते हैं कि आप के राज में ऐसा कभी नहीं हुआ। उत्तर में उसी क्षण महाराज जी अपने मुखारविन्द से कहते हैं कि अरे ऐसा होगा भी नहीं। इसी समय श्री मां जी भी सामने बैठी हुई थी उनका मन भी बहुत चिन्तित हुआ इस चिन्ता को मद्देनजर रखते हुए श्री महाराज जी ने अपर स्तर पर इस संकट से उबारने के लिए भरसक व अथक प्रयास भी किए यहां तक कि उनकी आंखों से पवित्र आंसू भी बहे। इतने में मेरे पतिदेव के वापसी के आर्डर संसारपुर टैरिस के हो गए थे और वह वहां जाना नहीं चाहते थे। आर्डर रूकवाने और सर्विस के हालात वेहतर बनाने के लिए Approch बगैरह भी बहुत लगवाई लेकिन काम बना नहीं और इसी सिलसीले में पैसा भी काफी खर्च हो चुका था जिस कारण हमारे आर्थिक हालात भी कमजोर हो गए थे, हम हार चुके थे। एक दिन हम दोनों निराश मन से आपस में विचार कर रहे थे कि अब क्या किया जाए, किसके पास जाए कौन सा ऐसा पण्डित हो जो हमारे प्रशन का उत्तर लगा कर बता दे कि हमें क्या करना चाहिए,हम असमंजस में पड़े हुए थे मै इनको कहती हूं कि हम तो सिर्फ मन्दिर महाराज जी के पास ही जाते हैं उन्हौने तो यह पण्डितों वाले प्रशनों का उत्तर नहीं बताना और किसी अन्य जगह का हमें पता नहीं है्। मन तो बहुत परेशान था कोई सही रास्ता भी नहीं दिखाई देता था।मन तो बहुत परेशान था कोई सही रास्ता भी नहीं दिखाई देता था।
ऐसे बातों-बातों में एक आध घन्टे के बाद इनके मन में पता नहीं क्या विचार आया अचानक ही मोटर साईकल उठाया और मन्दिर महाराज जी के पास चले गए वहां कुछ भक्तजन भी उनके पास बैठे हुए थे इनके पहुंचने पर एकदम महाराज जी पूछते हैं अरे आपकी नौकरी का काम बना कि नहीं, इन्हौंने सारी बातें बता दी। श्री महाराज जी के मुखारविन्द के यह शब्द "अरे पोस्ट वाली कुर्सी तो खाली है न, जाओ शुरू कर लो आप अन-जल को क्यों तोड़ना चाहते हो इस अनजल से तो भगवान राम भी नहीं छूट पाए उनको भी चौदह वर्ष के बनवास के लिए बनों में जाना पड़ा, आपको घर की चिन्ता है घर की जिम्मेवारी बाबा की रही, जाओ खुशी-खुशी अपनी नौकरी शुरू कर लो।" इतना कहने के बाद श्री महाराज जी ने ५०० रु० भी इनके हाथ दिए जो किसी अन्य भक्त ने श्री चरणौं में चढ़ाए हुए थे।
इसके बाद मेरे पतिदेव जब घर आए तो काफी उत्साहित थे और खुश भी थे क्योंकि हमारे उस प्रशन का उत्तर हमें मिल गया था और साथ में निर्णय भी जिसके कुछ घन्टे पहले हम दुविधा में फंसे हुए थे।
अगले दिन मेरे पतिदेव अपना समान बगैरह लेकर संसारपुर टैरिस रवाना हो गए और उन्हौंने अपनी नौकरी शुरू कर ली। कुछ ही दिनों में श्री महाराज ने ऐसा चमत्कार कर दिया कि दो हफ्ते के भीतर आर्डर बापिस कुल्लू के हो गए जहां कि हम चाहते थे। आखिरकार उनकी उच्च स्तर की promotion भी बहाल हो गई यह दो हफ्ते का ही तो अनजल था जिसे हम तोड़ना चाहते थे। यह सारी अनुकम्पा श्री महाराज जी और श्री मां जी के आशिर्वाद का ही तो प्रशाद है जो समय समय पर आपने प्रिय भक्तों को बांट दिया करते हैं। इन्ही बातों से ही तो मन बार-बार लिखने को करता है कि श्री महाराज जी हमारे लिए भगवान तो थे ही, एक पिता और सखा ज्यादा थे । परम पिता परमात्मा जी से यही प्रार्थना है कि हमारे अन्त समय मे भी श्री चरणों में रहने की कृपा बनाए रखें
श्री चरणों में मेरा शत शत प्रणाम
सुनिता

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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