Chapter 2.5

चित्रकूट की यात्रा
चित्रकूट की यात्रा फरवरी १९७३ में हुई। श्री महाराज जी ने चित्रकूट की यात्रा का निश्चय किया और स्व० श्री रघुवीर सूद को बुलाया गया। उनसे फल वाले जो कानपुर के थे उनकी जीप को लेने का प्रस्ताव किया गया। लाला जी मान गये लेकिन इस शर्त पर कि पैट्रोल, जीप की मरम्त तथा यात्रा का खर्च स्वयं वहन करना होगा। श्री महाराज ने शर्त मान ली और श्री डीनू राम (नारयण जी) को आज्ञा दी कि चित्रकूट जाने की तैयारी करो। श्री मां तथा उनकी माता जी, श्री डीनू राम, उनकी धर्मपत्नी तथा बच्चे तथा ईश्वरी भक्त भी तैयार हुए। सब भक्तों ने खर्च की जिम्मेदारी ले ली। लेकिन जीप इतनी पुरानी थी कि २०-३० किलोमीटर से अधिक ना जा सेकेगी ऐसा लगता था। परन्तु संक्ल्प सिद्ध बाबा श्री महाराज जी ने यात्रा आरम्भ कर दी। प्रथम दिन चण्डीगढ़ तथा दुसरे दिन दिल्ली जा पहुंचे। लाला के कहने पर जीप कार्यशाला में ले जाई गई। भक्त लोग चिन्ता करने लगे कि इस प्रकार जीप पर जाने कितना खर्च हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि सब धन यहीं कत्म हो जाए। बाबा ने भक्तों को चिन्तित देखकर कहा, 'डरो मत'। बाबा आगे-आगे और पैसे पीछे-पीछे। दो दिनों पश्चात् ज्यों की त्यों वापिस आ गई। सब प्रसन्न हुए कुछ खर्च नहीं हुआ। तीसरे दिन जीप दिल्ली से कानपुर की ओर चली। सढ़क के दोनों ओर लम्बे-चौड़े गेहूं और सरसों के खेत। अचानक ऐसा लगा कि जीप के आगे-आगे, दो रूपये, पांच रूपये, दस रूपये, और बीस रूपये के सैंकड़ों नोट उड़े चले जा रहे हैं। ऐसे लग रहा था जैसे नोट खेत से उड़कर सड़क पर आ रहे हैं। भक्त खुश हुए। किसी ने कहा 'जीप रोको'। तब बाबा ने हंसते हुए कहा "डरो मत लक्ष्मी आगे-आगे जा रही है।" रात को कानपुर रूके। दुसरे दिन कानपुर से इलाहबाद रवाना हुए। इलाहाबाद में तीन दिन खूब आनन्द किया। एक दिन नाव में बैठ और त्रिवेणी जाकर संगम में स्नान किया, भारद्वाज ऋषि का आश्रम, बूढ़े हनुमान जी, किला तथा संग्रहालय देखा। तीसरे दिन गाड़ी चित्रकूट की ओर चली। चित्रकूट के रास्ते में 'भरत कूप' में ठहरे। भरत-कूप में स्नान कर के उसकी महिमा का महत्व समझा। आंखों के आगे तुलसीदास जी द्वारा किया वर्णन साकार हो उठा।
देव देव अभिषेक हित गुर अनुशासन पाई।
आनेऊ सब तीरथ सलिलु तेहि कंह काह रजाई।।
भरत कहने लगे हैं स्वामी आपके अभिषेक के लिए गुरूओं की आज्ञा पाकर सब तीर्थों का जल ले आया हूं।
अत्रि कहेऊ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
राखिय तीरथ तोय तहं पावन अमिप अनूप।।
भरतकूप अब कहींवृहि लोगा।
अति पावन तीर्थ जल जोगा।।
प्रेम सनेम निभज्जन प्रानी।
हाईहींह विमल करम मन वानी।।
अतः भरत-राम का प्रेम, उनका मिलना और भरतकूप की महिमा साकार हो उठी और भरतकूप से चित्रकूट जा पहुंचे। चित्रकूट सुहावना एकान्त स्थान है। मन्दाकिनी नदी बह रही है। अनुसूया देवी ने अपने तप से इसे प्रकट किया है। अनुसूया का पवित्र स्थल आज भी दर्शनीय है। स्फटिक शिला जहां श्री राम ने मां जानकी सहित विश्राम किया था और जयन्त ने काक का रूप धारण धर चोंच मारकर यह परीक्षा ली थी कि क्या दशरथ का पुत्र राम परब्रह्म ही है, उसके दर्शन करते हुए गुप्त गोदावरी पहुंचे। यहां गुफाएं हैं जहां सीता कुण्ड तथा राम लक्ष्मण कुण्ड बने हैं। इन्हीं गुफाओं में भगवान राम के रहने का स्थल भी था। निवास-स्थान के साथ ही एक गुफा में निर्मल, स्वच्छ जल एक ओर से निकल कर दूसरी ओर लुप्त हो जाता है। भीतरी गुफा में राम कुण्ड में श्री महाराज जी ने चरण धोकर कहा,"चरणामृत ले लो।" उस समय वे भावावेश में थे। मां ने स्वयं चरणामृत पीकर अन्य भक्तों को भी चरणामृत दिया था।
दूसरे दिन कामनाथ पर्वत, जहां श्री राम ने सीता तथा भ्राता लक्ष्मण सहित निवास किया था, उसकी परिक्रमा करते हुए श्री महाराज जी सबसे आगे एक मधुर मस्ती में मचल रहे थे। और हमें भी ऐसा लग रहा था कि अभी त्रेतायुग की स्मृति साकार हो गई है। तत्प्श्चात तीसरे दिन 'हनुमान धार' की चढ़ाई चढ़ कर राम-भक्त हनुमान के उस रूप के दर्शन किए जिसमें लंका जलाकर वे इस धारा का जल पीकर शान्त हुए थे। मन्दाकिनी नदी के तट पर पांच सौ वर्ष पुराना बट-वृक्ष अब भी शोभायमान हैं।
चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़।
तुलसीदास चन्दन घिसें तिलक लेत रघुवीर।।
धन्य है यह भूमि और धन्य हुए भक्त तुलसी दास।।
अन्तिम दिन चित्रकूट में भण्डारे का आयोजन किया गया। खीर पूरी और आलू की सब्जी बनाई गई। गांव की कुमारी कन्याएं बुलाकर उनका पूजन किया, उन्हैं श्रद्धापूर्वक भोजन खिलाया। अचानक बाहर शोर सुनाई दिया। द्वार के बाहर झांका तो देखा कि सफेद टोपी व कुर्ता-पजामा पहने हजारों लोग एक लम्बी पंक्ति बनाए, हाथ में डण्डे लेकर खड़े हैं और जो घुस आए थे उन्होंने चित्रकूट निवासियों को पीटना शुरू किया है। जब एक युबक को बहुत पीटा तो उसकी पत्नी और बच्चा उसे बचाने के लिए बढ़े। वे बच्चे को उठाकर जाने कहां ले गए और स्त्री से भी दुर्व्यवहार किया। गांव होने के कारण केवल तीन सिपाही वहां थे जो दंगा रोकने के लिए आगे बढ़े। उनमें से एक सिपाही को भी दंगे में चोटे आईं। हम लोग सरकारी विश्राम-गृह में ठहरे हूए थे जो बाजार से बाहर एक ओर था। दंगा बढ़ता देख श्री महाराज जी ने कहा। "शीघ्रता से कार्य पुरा करो और बर्तन आदी लौटा करके यहां से चल पड़ो। तीन बजे हमने जीप बाहर निकाली। गांब का एक हलवाई, जिससे हमने सामान खरीदा था, हमारी जीप को सुरक्षित दंगे से बाहर निकालने में सफल हुआ। जब हम इलाहाबाद की ओर जा रहे थे, तो हमने देखा कि पुलिस की काफी गाड़ियां उधर जा रही थीं।
इस दंगा फसाद की जड़ जो घटना है वह कुछ इस प्रकार हैः- चित्रकूट के निवासी भगवान श्री राम को अपना अराध्य देव मानते हैं इसलिए वहां गांव में २० वर्ष से महामन्त्र "हरे राम हरे राम" का अखण्ड पाठ हो रहा था। इन दिनों 'जय गुरू देव' नामक दल पांच हजार लोगों को लेकर चित्रकूट आया। जगह-जगह 'गुरू देव' के फोटो और पोस्टर लगे हुए थे जो हमने भी पढ़े हुए थे। इनका विषय कुछ इस प्रकार था 'राम बुढ़ा हो गया है' नया जमाना कौन लायेगा-'जय गुरू देव'। कहते हैं कि 'गुरू देव दल' के कुछ लोग अखण्ड पाठ में जा धमके और उलटी सीधी बातें करने लगे। एक चित्रकूट निवासी इस अशोभनीय व्यवहार को देखकर उतेजित हो उठा। उसने बकवास करने वाले के मुंह पर एक थप्पड़ लगा दिया। बस पुरा दल उस व्यक्ति को मारने के लिए आ धमका और दंगा हो गया।
एक दिन इलाहाबाद में रहकर पुनः त्रिवेणी संगम में स्नान करके हम सब लखनऊ होते हुए रामपुर पहुंचे। श्री डीनू राम को रामपुर में एक इस्लाम धर्मावलम्बी फलों के पैकरों से काम था। इसलिए जीप उसके घर के सामने जाकर खड़ी हुई। गाड़ी देखकर बहुत से गरीब जो फटेहाल थे, एकत्रित हो गये। उस समय साथ में नमकीन दाल थी। जब बच्चों को बांटने लगे तो एक भी बच्चे ने प्रसाद नहीं लिया। और बच्चों ने कहा, 'हम नमक नहीं खाते।' रामपुर से हरिद्वार पहुंचे। हरिद्वार में उन दिनों मेला लगा हुआ था। शिवरात्रि निकट आ रही थी। दूर-दूर से गांव के लोग बढ़ी श्रद्धा से भगवान शिव का अभिषेक करने के लिए गंगा जल भरने आ रहे थे और गाते बजाते सुसज्जित वैहगियों में गंगाजल भर-भर कर ले जा रहे थे। गंगाघाट की शोभा दिन-रात अतुलनीय बनी हुई थी। उस समय हर की पौड़ी के सामने एक होटल में दो कमरे लिए थे। इसलिए रात्री तथा प्रातः चार बजे से ही यह भव्य द्रव्य दृष्टी-गोचर होता रहा। दो दिन हरिद्बार में पूजा अर्चना दान आदि करके कुल्लू लौट आए। सब भक्तों की प्रसन्नता का पारावार न रहा। सभी बार-बार गले मिलते और पूछते कि जीप तो ठीक चली। भगवत्कृपा से यह पुरानी जीप बिना किसी विघ्न बाधा के सौलह सौ किलोमीटर की यात्रा कर सुरक्षित मन्दिर लौट आई। मन्दिर में पहुंच कर प्रसाद बनाया और सब भक्तों को भोग लगाकर विदा किया।
मन्दिर में अब आने वाली शिवरात्रि की तैयारियां हो रही थीं। शिवरात्रि का उत्सव व्रत, तथा 'ॐ नमः शिवाय' के अखण्ड कीर्तन के साथ सम्पन हुआ।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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