Chapter 2.9

सीता राम सन्यासी तथा श्री मां की साधना
फरवरी १९७४ से अक्तूबर १९७४ का समय श्री महाराज जी ने मन्दिर के निर्माण कार्य में लगाया। इन दिनों श्री महाराज अधिक समय मन्दिर में ही रहते। भक्त लोग प्रातः और सांय उनके पास आते जाते रहते। कुछ अन्तरंग भक्त मन्दिर में रहकर भोजन आदि की समुचित व्यवस्था करते। मन्दिर के आस-पास का उबड़-खाबड़ क्षेत्र धीरे धीरे ठीक किया जा रहा था । ऊपर शिव मन्दिर के साथ वाला सन्यासी भी स्थान छोड़ कर चला गया था इसलिए सब ओर ध्यान अनिवार्य था। मन्दिर के सामने व्यास नदि के तट पर घाट बनाने का कार्य भी शुरू कर रखा था। कार्य अधिक था परन्तु कोई ऐसा त्यागी भक्त नहीं था जो बाबा के साथ दिन रात रह सके। बड़ी कठिनाई से 'सीताराम' नाम का अयोध्यावासी बैरागी साधु मिला जो मन्दिर में ही रहने लगा। वह प्रातः सायं आरती पूजा करता, फिर भोजन आदि की व्यवस्था करता। दिन के समय दर्शनार्थियों को चरणामृत-प्रसाद भी दिया करता। सीता राम मन्दिर में आ गया तो कठिनाई कुछ कम हुई। इन दिनों श्री मां भी प्रातः काल उठकर मन्दिर आतीं और यथाशक्ति सेवा करके आठ बजे घर लौटती। फिर पाठशाला जाती। अब धीरे धीरे उनका मन मन्दिर में ही रहने लगा और शरीर को वे जबरदस्ती घर और स्कूल धकेलती। परिणाम यह हुआ कि पाठशाला में भी किसी प्रकार की रूची न रही। कभी कभी पढ़ाई की घण्टी भी छूट जाती। घर पर मन न लगता और जब समय मिलता तभी पांव मन्दिर की ओर चल पड़ते। कई बार तो प्रातः चार बजे ही अकेले निकल पड़ती और मन्दिर पहुंचने के पश्चात भोर का प्रकाश होता। रास्ते में कई प्रकार के भय मन में उदित होते परन्तु राम-नाम का जाप सब भयों से मुक्त कर देता। कई बार घर में माता जी भी नाराज हो जाती, कहती कि रात दिन मन्दिर जाना उचित नहीं। परन्तु श्री मां की साधना तेल की धार जैसी बढ़ती रही। सब प्रकार की कठिनाईयों का सामना करते हुए श्री मां के पग बढ़ते ही रहे और श्री महाराज जी की कृपा और आर्शीबाद सदा उनके साथ रहा। अब श्री मां की छुट्टियां तो मन्दिर में ही कटतीं।
एक मंगलवार को प्रातः जब श्री मां घर लौटने को हुई तो सीता राम, जो अपने मन्दिर वाले वस्त्र उतार कर आया था, बोला "मां स्वामी जी को कहो कि सीता राम आज्ञा चाहता है।" उस समय लाला साधुराम भी वहीं खड़े थे। श्री महाराज जी ने सीता राम की बात सुन ली और बाहर आ गये। सीता राम ने प्रणाम करने के लिए जैसे ही श्री महाराज जी के आगे सिर झुकाया, श्री महाराज जी ने एक पैर से उसका सिर दबा कहा, "क्यों रे बाबा का अपमान करके जाना जाहता है? कपड़े क्यों खोल दिए हैं? कपड़े पहन कर जाओ।" परन्तु सीता सुनी अनसुनी कर दी और सिढि़यां उत्तरकर चला गया। अब और अधिक कठिनाई हुई। श्री महाराज जी सारा दिन नीचे घाट के काम में लगे रहते। मन्दिर भी और घाट भी, दोनों और का कार्य संभालना कठिन हो गया भोजन की कौन कहे। इसलिए श्री मां भोजन पकाकर मन्दिर भेज देती। परन्तु दो ग्रास खाने बाले बाबा को भोजन खाने का समय भी नहीं मिलता था। रात को कभी कभी भक्त लोग आकर भोजन पकाते। बाबा को इस प्रकार कार्यरत देखकर श्री मां के हृदय में एक टीस उठती और मन कहता छोड़ दे नौकरी । सेवा का सुअवसर है इसे पकड़ ले।" परन्तु यह सूक्ष्म आवाज शीघ्र ही दबकर रह जाती। फिर भी अब मन अधिकतर मन्दिर में ही रमा रहता इस वर्ष मन्दिर की जिम्मेवारी और बढ़ गई। मन्दिर में कोई भी उत्सव (जैसे दीवाली आदि) मनाया जाता तो श्री मां को घर का उत्सव छोड़कर मन्दिर में समय देना होता क्योंकि बाबा का आग्रह रहता कि मन्दिर में उत्सव मनाओ। मन्दिर में इस प्रकार कि तल्लीनता देखकर श्री मां के माता जी और भाई-बहिन चिन्ता में पड़ जाते।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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