Chapter 2.4

श्री महाराज का कर्मयोग, भक्ति आदि का क्रियात्मक पाठ
तीर्थ स्थल में आकर श्री कृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियां होने लगी। मूर्ति विग्रह को प्रतिष्ठत करने के लिए गर्भ मन्दिर में रखा गया और जन्माष्टमी के दिन बड़ी धूम-धाम के साथ मूर्ति विग्रह की प्रतिष्ठा हुई। हवन, कन्यापूजन , अखण्ड कीर्तन तथा एक विशाल भण्डारा सम्पन्न हुआ यह था सितम्बर १९७२ तक का वृतांत इसके आगे हम श्री महाराज जी की भक्ति के साथ-साथ उनके कर्मयोग की व्याख्या भी करेंगे। कर्मयोगी श्री महाराज जी ने वेदान्त तथा गीता को पूर्ण रूपेण। अपने मानवीय जीवन में चरितार्थ किया हुआ था। वह क्रियात्मक वेदान्त में विश्वास करते हुए जीवन व्यवहार में वेदान्त का प्रयोग किया करते। मानो श्री महादेवी तीर्थ वेदान्त का क्रियात्मक रूप देने के लिए प्रयोगशाला बनाई हो। वेदान्त दर्शन एक ऐसा दर्शन है जो केवल पढ़ने अथवा लिखने मात्र से समझ नहीं आ सकता इसलिए प्राचीन काल में भी ऋषि-मुनियों ने आश्रमों की स्थापना करके वेदान्त का प्रयोग अपने-अपने निजी जिवन में किया था। कई गृहस्थ ऋषि-मुनि भी हुए जैसे, मुनि विशिष्ट। विशिष्ट जी ने गृहस्थ आश्रम का निर्वाह करते हुए वेदान्त को किसी हद तक अपनाया था। यह हम सब भली-भांन्ति जानते हैं।
वेदान्त के अनुसार परमात्मा ही आत्मा के रूप में प्रत्येक जीव में विराजमान हैं इसीलिए परमात्मा के दर्शन के लिए आवश्यक हो जाता है कि हम प्रत्येक जीव की सेवा, परमात्मा के भाव से करें। श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने भी कहा, "शिव ज्ञान से जीव सेवा" और श्री महाराज जी कहा करते थे कि निष्काम सेवा ही पूजा है। अर्थात जब हम किसि भी जीव की सेवा अपने स्वार्थ-लाभ के लिए नहीं करते हैं बल्कि इस ज्ञान से करते हैं कि प्रत्येक जीव परमात्मा का ही रूप है, तो वही सेवा भगवान की पूजा बन जाती है। श्री महाराज जी ने श्री महादेवी तीर्थ में आदि शिव शक्ति, राम, कृष्ण आदि अवतार हनुमान, गणेश आदि देवताओं, श्री रामकृष्ण परमहंस, मां शारदा और स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूषों के अलग-अलग मन्दिर बना कर जनता को अपनी रूचि और भावनुसार पूजा करने का सुअवसर दिया है और हम देखते हैं कि इस तीर्थस्थल में सभी प्रकार के भक्त अपनी रूचि व भाव की तुष्टि करते हैं। एक ओर तो महादेवी तीर्थ में इस प्रकार भगवत पुजा-पाठ कीर्तन नाम आधार, हवन आदि सुकृत्य होते रहते हैं। दुसरी ओर नर को नारायण समझ कर उसकी सेवा के लिए सुन्दर व्वस्था हुई है। श्री महाराज जी ने अपने उत्तर कालीन जीवन में ही भाव-भक्ति के साथ-साथ जनता जनार्दन की सेवा प्रारम्भ कर दी थी। श्री महाराज जी के जीवन में त्रिवेणी धारा सरस रूप से बहती रही । एक ओर भाव-भक्ति एवं दुसरी ओर कर्म तथा सेवा। श्री महाराज कभी मिट्टी- पत्थर उठाकर मन्दिर निर्माण के कार्य में व्यस्त होते। अचानक भक्त लोग आ जाते। हाथ का सामान यथावत रख कर, स्टोव जलाकर चाय बनाई जाती और भाव भक्ति के भक्तों को पिलाते। क्या अद्दभुत दृष्य थे वे और कैसा सुन्दर समय था वह जब इस तीर्थ की धरा पर हाड-मांस का पुतला नंगे बदन अनथक परिश्रम करते हुए, हृदय के अन्तर में भाव-भक्ति को संजोए हुए, बड़ी व्यवहार कुशलता से जनता जनार्दन की सेवा करके अपने को धन्य मानता। उन्होंने अपनी इस प्रयोगशाला में सर्वप्रथम इस बात का प्रयोग किया कि किस प्रकार ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय करना चाहिए।
भक्ति क्या है और कैसे करनी चाहिए तथा भक्ति के लक्षण और परिणाम क्या हैं? इन सब बातों को लेकर श्री महाराज जी ने बहुत से परीक्षण किए और कई ढंगों से, इस बारे में लोगों को अपने जीवन के प्रत्यक्ष उदाहरण द्वारा समझाने की कोशिश भी की है। अल्पबुद्धि जीव भला क्या जान सकता है। फिर भी श्री महाराज की इस प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण सदा-सदा के लिए शाश्वत हैं और हम समय-समय पर उन्हैं प्रयोग में लाकर अपने जीवन में ढाल सकते हैं।
इसी प्रकार निष्काम कर्म-योग का परीक्षण भी अनूठे ढंग से हुआ। हमें ऐसी प्रोगशालाएं बहुत कम मिलेंगी। श्री महाराज का कहना है कि कोई भी आए, सज्जन या दुर्जन , हमारा व्यवहार सबके साथ एक जैसा ही रहना चाहिए। वह कहा करते थे "बाबा के सामने कई प्रकार के लोग आते, लेकिन बाबा अपने परिक्षण में लगा रहता और सबसे सम-व्यवहार करता।" चाय की केतली तथा खिचड़ी का पतीला सबकी सेवा के लिए हाजिर रहता। श्रीमदभगवदगीता में कहा है 'वासुदेव सर्वमितति स महात्मा सुदुर्लभः'
श्री महाराज प्रत्येक कर्म कुशलतापूर्वक किया करते थे। 'योगः कर्मसु कौशलम्, गीता के इस ज्ञान के अनुसार कुशलतापुर्वक किया हुआ कर्म ही योग बन जाता है। श्री महाराज जी का प्रत्येक कर्म योग ही था। अतः प्रत्येक कर्म इनके लिए परमात्मा से योग (जुड़ाव) का साधन था। सांसारिक मनुष्य दिन रात कितने कर्म करते हैं लेकिन उनके कर्मयोग न बनकर बन्धन बन जाते हैं। किस लिए? नाना प्रकार के कर्मजाल में फंसकर मानव सिर धुन-धुन कर रोता है विलखता है। अगर कर्म छोड़ दे तो फिर क्या लेकर रहेगा। यह प्रश्न उसके मन को बेचैन कर देता हैं। अगर कर्म करे दुख-सुख का चक्कर चल पड़ता है इसलिए श्री महाराज जी ने जन-साधारण तथा देश और समाज को अपनी प्रयोगशाला का साकार रूप दिखाकर बताया कि कर्म करते हुये भी सुख दुखः से ऊपर उठ सकते हैं। ज्ञान के प्रकाश में किया कर्म तथा भक्ति द्वारा संचित कर्म ही निष्काम सेवा कहलाता है। जन साधारण को पुकार-पुकार के कह गए हैं,"आओ मेरे साथ हम मिलकर कर्म करें"-और कर्म करते हुए भी निर्लिप्त रहैं। आज भी उनका प्रयोग हम सबको सूचना दे रहा कि भगवतकर्म के लिए निमित बनो 'कर्ता नहीं। कर्ता भाव ही दुःख का कारण है।
यह त्रिगुणात्मक सृष्टि ही भगवान की आदि शक्ति है। इसी को महामाया कहते हैं। 'महामाया के छोड़ने पर ही भगवान के दर्शन होते हैं। शक्ति की उपासना द्वारा महामाया की कृपा होती है।'वेदान्त के नाम द्वारा मनुष्य अपने स्वरूप को पहचानता है। उसे लगता है-ब्रह्म ही मेरा स्वरूप है। इसलिए वेदान्त ज्ञान के लिए शुद्ध सत्वगुण का होना अनिवार्य है। श्री महाराज जी ने महामाया की उपासना के लिए महादेवी तीर्थ का प्राकट्य किया है। इस प्रकार ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों का समन्वय उनके जीवन में रच-वस गया था, और आज भी तीर्थ के कार्य कलापों में तीनों का समागम दृष्टिगोचर होता है। श्री रामकृष्ण परमहंस जी के शब्दों में ज्ञानी -योगी और भक्त सब उन्हैं खोज रहे हैं। ज्ञानी कहते हैं- 'ब्रह्म, योगी कहते हैं - आत्मा-परमात्मा, भक्त कहते हैं भगवान। श्री महाराज की जीवनचर्या में चाहे वह तीर्थाटन में हो, या किसी भक्त के घर अथवा अपने स्थान में, सर्वत्र हर समय हम उन्हैं ज्ञान, भक्ति और कर्म से युक्त देखते हैं।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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