Chapter 2.11

श्री मां का महादेवी तीर्थ में स्थाई आगमन
इस समय तक श्री मां ने निश्चय कर लिया था कि अब घर न जाकर सीधे मन्दिर चली जाऐंगी। इसलिए कुल्लू पहुंच कर सब भक्त तो अपने- अपने घर चले गए और श्री मां जी महाराज जी के साथ 'वैष्णू माता के मन्दिर' अर्थात 'महादेवी तीर्थ' में आ गई। श्री मां का यह आगमन सदा-सदा के लिए हो गया। श्री महाराज जी ने अपनी छोटी कुटिया श्री मां को सौंप दी और स्वयं जूते खोलने वाले स्थान के साथ एक ओर टूटे फूटे तख्ते जोड़कर एक कुटिया बनाई जिसमें बोरी लटका कर दरबाजों का काम लिया गया। दिसम्बर का महीना, भारी बर्षा और हिमपात के कारण अत्यधिक सर्दी ने भी श्री महाराज जी (जिनकी आयू उस समय लगभग ७८ बर्ष होगी) तपस्या की जीवन्त मूर्ति दिखाई देते। कुटिया में एक ओर श्री महाराज का भूमिआसन, बीच में धूना और दूसरी ओर आने बालों के लिए बैठने का स्थान।
इस प्रकार श्री मां का नवजीवन आरम्भ हुआ। १३ दिसम्बर १९७४ की प्रातः श्री मां के लिए शुभ- प्रभात तथा नव प्रभात दोनों ही एक साथ लेकर आई। दोनों का भव्य स्वागत करते हुए श्री मां ने सांसारिकता का बन्धन त्यागकर आध्यात्मिक जीवन की तपस्या आरम्भ की। आज ही भक्त जगदीश अपनी नव-विवाहिता पत्नी सहित श्री महाराज जी के दर्शनार्थ आये। जगदीश लगभग१९६५ से ही श्री महाराज की सेवा के लिए तथा आध्यात्मिक लाभ के लिए मन्दिर में आते रहते हैं। वे खादी कमीशन में नौकरी करते हैं। उन्हौंने गंगासागर की यात्रा भी श्री महाराज जी के आदेशानुसार ही की थी। जगदीश का विवाह ७ दिसम्बर १९७४ को हुआ। इधर श्री महाराज जी इन दिनों वैष्णू देवी की यात्रा में थे। इसलिए विवाह के अवसर पर जगदीश को श्री महाराज का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त करने का सुअबसर प्राप्त नहीं हुआ था। इसलिए वह नवविवाहिता पत्नी को लेकर आशीर्वाद प्राप्त करने आया था। पती पत्नी युगल ने श्री महाराज जी के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री मां ने तब जगदीश को बताया कि वे अब घर एवं स्कूल न जाकर पूरा जीवन मन्दिर में ही लगा देंगी। वे दोनों यह सुनकर आश्चर्य चकित रह गये। जगदीश का श्री महाराज की ईश्वरीय शक्ति पर विश्वास था इसलिए उसने विरोध नहीं किया, परन्तु उसने श्री मां के घर वालों को इसकी सूचना दे दी।
श्री मां की माता की यह सुनते ही ममता उमड़ पड़ी। भला वे अपनी बेटी को कैसे जंगल में अकेला रहने की आज्ञा दे सकती थीं। सूचना पाते ही वे मन्दिर दौड़ी आई। रो-रोकर कहने लगीं, कि घर चलो। परन्तु जब देखा कि बेटी का निश्चय अटल है तो कहा, "नौकरी नहीं करनी न करो घर पर ही रहौ। घर में रह कर पूजा पाठ करो। परन्तु सायंकाल होने पर श्री मां की माता जी को अकेले ही घर लौटना पड़ा। दूसरे दिन बहिन आई और फूट फूट कर रोने लगी परन्तु किसी को इतना साहस न हुआ कि बहिन का हाथ पकड़ कर साथ घर ले जाएं। भाई भी उदास मन से आए और निराश होकर चले गये। धीरे-धीरे सब रिशतेदार आए परन्तु श्री मां को कोई भी अपने निश्चय से न डिगा सका। बात धीरे-धीरे सारे नगर में फैल गई और स्कूल में भी सभी जान गए। अतः विद्यार्थी अपनी अध्यापिका से मिलने आने लगे। मन्दिर का तपस्वी जीवन देखकर सभी चकित रह जाते। श्री मां इस प्रकार कुछ दिन सामान्य वस्र ही पहनती रहीं। फिर एक दिन भगवा साड़ी रंगवा कर पहन ली, जिसमें सभी आशंकाऐं समाप्त हो गई और श्री मां का आध्यात्मिक जीवन पूर्ण रूपेण आरम्भ हो गया।
अब श्री मां प्रातः ३ बजे उठ जाती। कई बार श्री महाराज पहले जगकर धूना तेज करते और पानी गर्म करके मां के स्नान के लिए स्वयं ले आते। उन दिनों मन्दिर में स्नानागृह आदि नहीं बने थे और सामान्य प्रबन्ध भी नहीं था अतः बाहर पहाड़ की खाई जैसे स्थान में ही स्नान करना होता था। स्नानादि करके मन्दिर के मूर्ति- बिग्रहों का अभिषेक, पूजा आदि श्री मां स्वयं करती। आरती के लिए अधेड़ उम्र के एक पण्डित जी थे। प्रातः ६ बजे आरती सम्पन्न हो जाती। महामन्त्र 'हरे राम हरे राम' का पाठ श्री मां को लिखकर करना होता था। इसलिए ७ बजे तक श्री मां पाठ करती। फिर ८ बजे दाल- भात आदि सादा भोजन तैयार करके श्री महाराज को भोग लगाती। तत्पश्चात पण्डित जी को खिलाकर स्वयं भोजन करती।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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