Chapter 2.10

वैष्णु देवी पैदल यात्रा १९७४
धीरे धीरे समय सरकता गया और श्री मां का मन किसी निश्चयात्मक स्थिति में पहुंचने के लिए व्याकुल रहने लगा। इन्ही दिनों श्री महाराज जी ने इच्छा व्यक्त की कि वे कुल्लू से वैष्णु देवी (जम्मू) तल पैदल यात्रा करेंगे। कुछ एक अन्तरंग भक्त भी पैदल यात्रा के लिए तैयार हो गए। श्री महाराज जी ने श्री मां को भी पैदल यात्रा पर चलने के लिए कहा, परन्तु श्री मां ने इन्कार कर दिया क्योंकि इतनी लम्बी पैदल यात्रा पर जाना श्री मां के लिए सामाजिक दृष्टि सो ठीक न लगा और कोई स्त्री साथ नहीं थी। इस पर श्री महाराज ने कहा, "जब बाबा कटड़ा पहुंच जाएगा तो तार देगा और आप भक्तों को लेकर कटड़ा आ जाना। वहां से हम सब इकट्ठे होकर मां के दर्शनों के लिए जाएंगे।"

१९ नवम्बर १९७४ को प्रातः श्री महाराज जी पैदल यात्रा पर चल पड़े। उनके साथ चार अन्य व्यक्ति भी थे। मन्दिर का कार्य एक अन्य भक्त को सोंपा गया था। १३ दिन की पैदल यात्रा के बाद श्री महाराज जी कटड़ा पहुंचे और वहां से तार कि ३ दिसम्बर को कटड़ा पहुंच जाओ। श्री मां कुछ अंतरग भक्तों को साथ ले कुल्लू से पठानकोट, जम्मू होते हुए कटड़ा पहुंची। कटड़ा में श्री महाराज जी के दर्शन हुए और सब खुशी-खुशी आगे का कार्यक्रम बनाने लगे। लेकिन कटड़ा में भारी वर्षा होने के कारण मां वैष्णों देवी के दर्शनों के लिए जाना कठिन हो रहा था। दो दिन कटड़ा में ही विश्राम हुआ। ६ दिसम्बर को कटड़ा से यात्रा आरम्भ की। वर्षा तो थम चुकी थी परन्तु ऊपर पहाड़ पर भारि हिमपात के कारण यात्रा कठिनतम हो गई थी। दोनों ओर बर्फ की बड़ी- बड़ी दिबारें थी और बीच में तंग रास्ता। भक्त सब प्रकार की कठिनाइयां सहते हुए आगे बढ़ रहे थे और मां का जयकारा बोल रहे थे। श्री महाराज जी का अदम्य उत्साह और श्रद्धा भक्ति हम सबको अनेक प्रकार की कठिनाईयां सहन करने की क्षमता प्रदान कर रहे थे। आखिर सायंकाल हम सब 'दरबार' में पहुंचे। धर्मशाला में एक कमरा ले लिया। वहां कुछ देर विश्राम करके श्री महाराज समाधि में चले गए और हम सब 'दरबार' की और आ गये। वहां हमें रात १२ बजे दर्शनों का समय मिला। इसलिए पुनः धर्मशाला में आ गए। आधी रात को पुनः मां की गुफा के सामने कर-बद्ध खड़े हो गए। पंक्ति- बद्ध ही हम भीतर गये। भीतर मां के दर्शन से मन एक अपार आनन्द की अनुभूति में लीन हो गया। इससे पूर्ब भी पांच बार मां के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था परन्तु इस बार मां का साक्षात्कार हो गया। श्री मां को ऐसा लगा कि मां ने अपनी ज्योति श्री मां के भीतर (ह्रदय में ) जगा दी है। बस दर्शन करने के पश्चात मन को बैराग्य और विवेक ने आ घेरा और सांसारिक मोह-ममता रफू चक्कर हो गई। दिव्य आन्नदमय-जीवन लीलाधारी श्री महाराज जी को श्री मां ने अपनी इस अनुभूति के बारे में बताया तो बे हंस दिए। ऐसा लगने लगा कि कहीं मां भीतर बैठकर आबाज दे रही है कि नौकरी छोड़कर घर-बार छोड़कर, मां की ममता त्याग कर तथा सामाजिक बन्धनों से ऊपर उठकर तू भागवत् कार्य करदूसरे दिन पहाड़ उतरकर सब कटड़ा पहुंचे और रा‍त्रि कटड़ा में रहकर फिर जम्मू और पठानकोट आये। पठानकोट से चलकर रास्ते में 'शाहपुर' नामक गांव में एक रात्रि रहकर वहां एक मन्दिर को पुनः जागृत किया। वहां जनता ने भी श्री महाराज जी को बताया कि वह मन्दिर को पुनःजागृत किया। वहां जनता ने भी श्री महाराज जी को बताया कि वह मन्दिर बड़े चाव से बनाया गया था। मां की मूर्ति की प्रतिष्ठा भी हुई है परन्तु मां का यह मन्दिर श्मशान जैसा लगता है। लोगों को वहां जाते हुए भय लगता है। तब श्री महाराज जी ने रात को वहां ठहर कर मां का वात्सल्यमयी रूप पुनः जागृत किया। रात्री-जागरण किया। प्रातः मां की मूर्ति की प्राण प्रतिष्टा की। कन्या-पूजन किया और प्रसाद बनाकर सबको बंटबाया। दूसरे दिन आगे चले और ज्वाला-मुखी, चिन्तपूर्णी, कांगड़ा और चामुण्डा होते हुए १२ दिसम्बर १९७४ को सायंकाल कुल्लू पहुंचे।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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