Chapter 2.1

वैष्णु देवी की यात्रा १९७०
जैसे कि श्री महाराज जी अब अपने को धन्य समझने लगे और उनका पूरा-पूरा ध्यान अपनी मां के श्री चरणों मे लगा रहता था। तो उन्होंने कुल्लू से कटड़ा तक की यात्रा के लिए एक निजी बस का प्रबन्ध किया, जिसमें अधिकतर महिलायें थीं और पुरूष दो चार ही थे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था- श्री स्वामी जी का वात्सल्य भाव। इन दिनों श्री स्वामी जी मुख्यतर 'मां-मां-मां' के रंग में ही रंगे रहते। उन्हैं अपने भीतर बाहर सब ओर मां के ही पावन दर्शन होते। जिस-जिस महिला को पता चलता कि 'बाबा जी' बस लेकर "वैष्णु देवी" जा रहे हैं,वह झट से न आव देखती न ताव और जिस हाल में बैठी हो उठकर वेष्णो देवी पहुंच जाती और बाबा जी से कहती "बाबा जी मैं भी चलूंगी आप के साथ वैष्णो देवी।" उस समय बाबा जी कितने प्यार से उत्तर देते, उनके मुख-मण्डल पर कितना वात्सल्य आ जाता जब वे कहते "मां आप जरूर चलोगी, आप तो मेरी मां हैं।" और दोनों हाथों से चरण-स्पर्श करते मानो कोई पांच वर्ष का बालक यह सब कह रहा हो और कर रहा हो।
"मां देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण सस्थिता" ऐसे मातृभाव की पराकाष्टा को आत्मसात् कर श्री महाराज ने परमहंस अवस्था प्राप्त कर ली थी। अस्तु, दो तीन घण्टों में ही पचास माताएं यात्रा के लिए तैयार हो गई। मां का जयकारा बुलाकर प्रातः बस चली। सब माताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था। सारा दिन की यात्रा के पश्चात रात्री समय बस कटड़ा पहुंची। श्री महाराज ने सब माताओं के ठहरने का उचित प्रबन्ध करवाया। भोजन की सुव्यवस्था की गई।एक दिव्य आनन्द में रात कटी। प्रातः शौच स्नान से निवृत हो सबने जलपान किया और फिर पैदल यात्रा आरम्भ हो गई। बच्चों और माताऔं को बड़े प्रेम से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए श्री महाराज कभी भक्त मण्डली के आगे और कभी पीछे चलते। इस प्रकार मां का जयकारा बुलाते हुए बाण गंगा से गर्भजून तक पहुंचे। सब महिला भक्त जयकारा लगाती रहीं, प्रेम से वोलो -जया माता दी। सारे बोलो-जय माता दी। पहाड़ भी बोलन-जय माता दी। सारी भक्त मणडली इसी प्रकार प्रेमपूर्वक तथा भक्ति भाव से हाथी मत्था पहुंच गई। कुछ देर विश्राम करने के पश्चात श्री महाराज प्रेरणा देकर भक्त मण्डली के पीछे चलने लगे। भैरों घाटी से मां की गुफा को प्रस्थान हुआ। मान्यता के अनुसार मां के दर्शनों के पश्तात् ही भैरों के दर्शन करने चाहिए। आखिर सायंकाल हम सभी मां के मन्दिर पहुंच गये। वहां पर कमरे लेकर सबको रहने की व्यवस्था की गई। रात्रि में भजन कीर्तन हुआ। प्रातः काल स्नानादि कर के सब ने मां की गुफा के भीतर जाकर मां के दर्शन प्राप्त कर सबको दिव्य आनन्द की प्राप्ति हुई। दर्शनों के पश्चात भोजन करके, श्री महाराज जी भक्त मण्डली को लेकर चल पड़े। लौटती बार रास्ते में भैरों के दर्शन किए। फिर भक्त मण्डली धीर-धीरे कटड़ा की ओर बढ़ी। सायंकाल सब कटड़ा पहुंचे और रात वहीं विश्राम किया। वैष्णु देवी की यह यात्रा १३-११-१९७३ को की। दूसरे दिन हमारी बस कटड़ा से जम्मू होते हुए पठानकोट और चिन्तपूर्णी पहुंची। मां चिन्तपूर्णी के दर्शनों के बाद बस ज्वालामुखी की ओर बढ़ी। ज्वालामुखी में धर्मशाला में रुक गए। धर्मशाला में एक बड़े भण्डारे का आयोजन किया गया। सब भक्तों व माताओं ने मिलकर भोजन तैयार किया। हलवा पूरी व सब्जी बनाई गयी। नव कन्या पुजन हुआ फिर सब भक्तों को भण्डारा खिलाया। इस प्रकार पूरा दिन प्रसाद वितरण होता रहा। रात्रि वहीं निवास हुआ। दूसरे दिन बस ज्वालामुखी से कांगड़ा, चामुण्डा होते हुए कुल्लू वैष्णुदेवी पहुंची।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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