Chapter 1.5

महादेवी तीर्थ का प्राकट्टय
आईए हम उस अतीत की ओर चलें जो श्री महादेवी तीर्थ की पृष्ठभूमि है। श्री महादेवी का प्राकट्टय क्यों हुआ? कैसे और कब हुआ? कई प्रश्न हमारे सामने उभर कर आते हैं। इन सब प्रश्नों के उत्तर हमें श्री महाराज जी (बाबा) के मुखारबिन्द से ही सुनने को मिले हैं। उन्हीं के शब्दों को थोड़ा इधर-उधर करके लिखने का यहां प्रयास किया जा रहा है।'
बाबा ने हमैं बताया, जब वह केवल पांच बर्ष के ही थे, तो लगा कि उन्हैं ऐसी मां की गोद में जाना चाहिए जो अमर है जो जगतजननी और वात्सलय की मूर्ति है। इस अनुभूति की पृष्ठभूमि यह है कि जब बाबा, अपने मामा की गोद में खेल रहे थे। तो उन्हौंने मामा से प्रश्न किया, "मेरी मां कहां है?" तो मामा ने कहा, "तुम्हारी मां तो ऊपर, भगवान के घर में हैं।" उसी दिन से दृढ़ संकल्प ले लिया कि इस जीवन में अवश्य मां की खोज करूंगा। लेकिन उक्त समय से लेकर ब्रह्मलीन होने तक पिछले, सन १९६३ तक के व्यतीत जीबन के बारे में उन्हौंने क्रमबद्ध कभी भी कुछ नहीं बताया। बाबा बताते थे कि जब वह नंगे पांव, नंगे बदन भारत भ्रमण में थे, तो उन्हैं एक आबाज सुनाई दी जिसका आशय यह था "तुम्हारी मां, बायण्य दिशा में है।" अब क्या था, पैर उसी दिशा की तरफ बढ़ने लगे। बाबा का कहना है कि वह १९६१ में आखाड़ा बाजार कुल्लू में प्रथम बार आये और कुछ दिन पीपल के चबूतरे पर ठहर कर लाहुल स्पिति की ओर बढ़े परन्तु मां का कुछ पता न चला। खोज करते हूए नाना प्रकार के दःख कष्ट सहन करते हुए पांगी-घाटी से चम्बा की ओर प्रस्थान किया। एक बार बर्फ के नाले में लगभग एक किलोमीटर नीचे गिर गए। तब दो आदमियों ने उन्हैं रस्से डालकर ऊपर खींचा। बाबा ने बताया, बहां उन्होंने आग जला रखी थी। मुझे पुरी तरह से गर्म किया और कम्बल झोली आदि लेकर मुझे सामने हलवाई की दुकान तक चलने को कहा। मैं ठिठुरता हुआ धीरे-धीरे हलवाई के पास पहुंचा तो हलवाई की दयालुता देखने वाली थी। उसने शीघ्रता से आग की भट्टी के पास विस्तर पर मुझे लिटा दिया-दो तीन कम्बल उढ़ाकर मुझे गर्म-गर्म दूध पिलाया। तीन चार घण्टे के पश्चात शरीर कुछ गर्म हुआ। हलवाई ने तन-मन-प्राण एक करके बाबा की सेवा की। इस प्रकार बाबा जीवन की बाजी लगाते हुए चम्बा पहुंचे व चम्बा से पठानकोट होते हुए कटड़ा साहिब। कटड़ा से जाकर वैष्णू मां के दर्शन किए। मां के दर्शनों के बाद बाबा भाव-विहवल होकर जंगल में जाकर 'मां-मां' पुकारने लगे दिन भर ऐसी ही अवस्था बनी रही। रात हो गई लेकिन बाबा को भाव समाधि लग गई। माता का साक्षात्कार हुआ। यहां देवी ने दर्शन दिए और सिर पर हाथ फेर कर कहा , "बेटा तुम आ गये। मैं तुमसे अति प्रसन्न हूं। कुल्लू घाटी में जाओ। वहां हजारों वर्ष पुरानी गुफा गुप्त रूप में विराजमान है। जहां उमा रूप में भगवान शिव की प्राप्ति के लिए मैंनें तप किया था। अब उसे पुनः प्रकट करके त्रिविध ताप से तपित जन समूह को शान्ति प्रदान करो।" मां का आशीर्वाद शिरोधार्य करके बाबा दूसरी बार फिर कुल्लू आये और अखाड़ा बाजार स्थित पीपल के चबूतरे पर निवास किया। बाबा की आंखे पुनः-पुनः मां के दर्शनों के लिए व्याकुल रहती। उनको पुरा विश्वास था कि मां उन्हैं साकार रूप में मिलेगी। अतः १९६२-१९६४ तक बाबा इसी चबूतरे पर मां की प्रतीक्षा करने लगे। बाबा की पीपल के चबूतरे पर मां की जीवन लीला हम पीछे देख आए हैं। साथ ही वर्णित हुआ है उनका पीपल से उठकर 'जोखू नाला' में निवास और शिवलिंग की स्थापना, विशाल भण्डारा और फिर एक सन्यासी के स्थान मांगने पर उसे देकर वर्तमान त्रिमूर्ति के स्थान पर आ बेठना। और वहीं से 'श्री महादेवी की' गुफा का निर्माण कार्य शुरू होना। अब हम देखेंगे कि बाबा किस-किस प्रकार तन्मय होकर मां की प्रतिष्ठा के लिए दिन रात व्याकुल रहते। कर्मयोग की साधना और जनसमूह के प्रति, प्रेमभाव इनके उद्देश्य- प्राप्ति के सुलभ साधन बने
बाबा के जीवन का चरम उद्देश्य था श्री महादेवी की गुफा का जीर्णोद्वार करके श्री महादेवी की पुनः प्रतिष्ठा करना और साकार रूप में चलती-फिरती मां के दर्शन करके जनता का, समाज का, नारी जाती के प्रति मातृभाव की पुनः स्थापना एवं समाज कल्याण।
सर्वप्रथम हम देखेंगे कि बाबा ने किस प्रकार बर्तमान गुफा का निर्माण किया और मां महादेवी की प्राण प्रतिष्ठा की, तथा उस कार्य में कितना सहयोग मिला और कितनी कठिनाईयां आई। बाबा अब इस नये संघर्ष में जुट गये। बाबा की आध्यात्मिक साधना में हम देखते हैं कि बाबा के सम्पर्क में आने वालेप्रत्येक पुरूष उनके लिए भगवान थे और प्रत्येक स्त्री, मां जगत जननी, प्रत्येक कन्या बहिन। जो भी स्त्री उनके पास आती, बाबा उन सबके चरण स्पर्श करते हुए कहते- "मां,बैठिये।" कितने प्यार से चाय या खिचड़ी जो भी उस समय की परिस्थितियों के अनुसार होता, उसका मां भगवती को प्रसाद खिलाकर निहाल हो जाते। ऐसे लगता-'मां देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण सस्थिता।' सर्वभूतों में मां ही विराज रही है। उनका वात्सल्य भाव देखते ही बनता। चर और अचर सबमें उनको मां भगवती के ही दर्शन होते। लेकिन मां की प्रतिमा अथवा किसी भी स्त्री को देखकर उनका वात्सल्य भाव चरम अवस्था को छू जाता। उनके दिव्य तथा अनूठे प्रेम का पान करने के लिए दूर-दूर से भक्त महिलायें आ एकत्रित होतीं। माताओं को भी ऐसा प्रतीन होता मानो बाबा को खिलाकर उन्होंने बाल गोपाल को ही तृप्त किया है। बाबा तो भाव के भूखे थे। वह विशेष रूप से मां के हाथ से झोली खींच कर देखते, कि मां इनके लिए क्या लाई है। इस प्रकार मातृभाव की साधना एक ओर तथा दूसरी ओर होता रहा गुफा का निर्माण।
मेधावी बाबा ने अपनी तीक्ष्ण तथा सूक्ष्म बुद्धि से अन्तर्ध्यान में देख लिया कि 'जोखू नाला' के जल से आच्छादित गुफा के प्राकट्टय के लिए सर्वप्रथम इसके जल प्रवाह को पहाड़ी के ऊपरी भाग से ही बांई ओर मोड़ना होगा। जल प्रवाह की दिशा मोड़ने के लिए ऊपर से ही पानी का रास्ता बदल दिया गया। पहाड़ को तराश कर कच्ची नाली बनाई गई। यह कटाव गुफा से लगभग ४०० फुट ऊपर से है। अब जल उस नई रास्ते से बहने लगा। और चट्टान के नीचे गुफा का मुख्य प्रवेश द्बार दिखाई देने लगा भीतर से गुफा कटी हुई टेढ़ी मेढ़ी थी । इतनी तंग कि भीतर जाना कठिन था द्वार के आगे गहरा गड्डा था, और सड़क तक दोनों ओर बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं। सड़क से गुफा द्वार तक आना असम्भव था। उन दिनों बाबा के पास लोग दाईं ओर की पगडण्डी से आते थे। धीरे- धीरे गुफा साफ की गई। औजारों के साथ पत्थर -गुफा के भीतर का ऊपरी भाग तराशा गया। भीतर जल बह रहा था, उसको भी एक दिशा दी। पूरी गर्मी काम चलता रहा और सर्दियों में शिवरात्रि के दिन मां की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा का संकल्प हुआ। एक भक्त ने बाबा को आश्वासन दिया कि वह बाबा को अपनी जीप में साथ ले जाकर धन देकर मां की मूर्ति ले आयेगा। लकिन शिवरात्रि से आठ दिन पूर्व भक्त ने अपनी मजबूरी प्रकट करते हुए जाने से इन्कार कर दिया। तो श्री महाराज ने उसी समय कहा, महादेवी की स्थापना शिवरात्री को ही होगी, अन्यथा यह बाबा इसी गुफा में उस दिन प्राण त्याग देगा। उस रात बाबा बाहर से चिन्तामग्न दिखते हुए चट्टान पर बैठे रहे, वास्तव में वह भाव मग्न थे। लगभग आधी रात बीत चुकी थी। जब एक जीप सड़क पर आ कर रुकी। जीप से एक महिला व पुरूष उतरे, और सीढ़ियां, जो उस समय उबड़-खाबड़ रास्ता ही था, चढ़कर गुफा के निकट, श्री महाराज के पास पहुंचे, स्त्री,'श्रीमती अवतार चन्द भूपला ने अपने दोनों हाथों से सोने के कंगन उतार कर, बाबा के चरणों में रख दिए और विनती की कि वह उसे प्रयोग में लाकर अपना संकल्प पूरा करें।' बाबा कहते हैं,"मुझे लगा की साक्षात महादेवी ही अपने कार्य हेतु आ उपस्थित हुई हैं।" भक्तों ने प्रातः ही हरिद्वार का कार्यक्रम बनाया और शीघ्र ही बाबा, मां की मूर्ति लेकर आ गये। बाबा ने बताया कि उन कंगनों का तो प्रयोग ही नहीं किया गया। शिवरात्री के दिन बड़ी धूम-धाम से श्री महादेवी का अभिषेक हुआ और मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई। हजारों श्रद्धालुओं ने मां की जय-जयकार की। हवन, कन्या पूजन व भण्डारा हुआ। शहर से बच्चे-बूढ़े, स्त्री- पुरूष, सब वर्गों व जातियों के लोग, कुछ गाड़ियों में, कुछ पैदल, मां वैष्णूदेवी की जयकार करते हुए मन्दिर की ओर आने लगे। भक्तों की भीड़ जमा हो गई। सबके मुंह से एक ही आवाज़ आने लगी-चलो माता वैष्णु के मन्दिर में। अब भक्तों के लिए दो आकर्षण हो गए। एक ओर बाबा, दूसरी ओर मां। लेकिन विनम्र सरल, बाबा चाहते थे कि उनकी मां (महादेवी) के पवित्र नाम का ही प्रचार हो। इसलिए वह भक्तों को बार-बार कहते कि पहले मां के दर्शन करो।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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