Chapter 1.4

एक दिन सांयकाल बाबा धूने के पास बैठे थे, धूने के सामने पंचमुखी नाग फन उठाये बाबा को देख रहे थे। बाबा ने हाथ जोड़कर आंखें बन्द कर ली और कहा,प्रभो, मेरे पास यह शरीर है, जो आप को अर्पण करता हूं, लेकिन दूसरे ही क्षण आवाज आई, "यहां महादेव जी की स्थापना करो।" बाबा ने आज्ञा शिरोधार्य की और व्यास नदी में जाकर डुबकी लगाई, एक शिला जो हाथ में आई, उसे लाकर स्थापित कर दिया और वह आदि शिवलिंग हुआ, जो आज भी महादेव गुफा के द्वार के पास ही स्थापित है। स्थापना एवं प्रतिष्ठा के सुअवसर पर अखण्ड कीर्तन 'ॐ नमः शिवाय' के चौबिस घण्टे की ध्वनि से आकाश मण्डल गून्ज उठा। तत्पश्चात विशाल यज्ञ हुआ, जिसकी सुगन्धि से वायुमण्डल पवित्र व सुगन्धित होकर झूमने लगा।
फिर कन्या पूजन करके बाबा, भगवती मां पार्वती की अर्चना-पूजन करते हुए, भाव-समाधिस्थ हुए। सब भक्तों द्वारा, हर-हर महादेव की ध्वनि से जोखु नाला गुंजायमान हो उठा। हलवा-पूरी व चने का प्रसाद जनता-जनार्दन में वितरित किया जाने लगा। भण्डारा अपनी चरम सीमा को छू गया। तीन दिन लगातार जनता आती रही और भण्डारा चलता रहा। श्री राम पण्डित ने पूजा-पाठ-हवन सम्पूर्ण हो जाने के बाद कहा कि वह समय निकट ही है जब सामने नीचे वाली सड़क पर मोटर-गाड़ियों की कतारें लगेंगी। जनता की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। साथ ही इस अद्दभुत व्यक्तित्व के प्रेम भरे आकर्षण से हृदय स्वयं ही कह उठता- "धन्य है यह बाबा और उनका जीवन। हे मानव् तुम्हैं भी ऐसे प्रेमी भक्तों के जीवन से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए और प्रत्येक जीव तथा मानव, स्त्री- पुरूष, अमीर-गरीब, सेवक ब्राह्मण-चाण्डाल सबके प्रति प्रेम करना चाहिए। तुलसी दास जी के शब्दों मेः
"सिय राम मय सब जग जानी। करहूं प्रणाम जोरी जुग पानी।"
"निज प्रभुमय देखहिं जगत, केहिं सन करहि विरोध।।"
ऐसे ही थे यह बाबा, प्रेम और मुहब्बत के स्वामी।
भण्डारे के दौरान एक सन्यासी, माधवानन्द जी पधारे। सन्यासी का स्वागत हुआ। बाबा के आदेशानुसार भक्तों ने सन्यासी की प्रेम पूर्वक सेवा की। प्रेम और सेवा के स्वामी, बाबा जी के श्री चरणों में सन्यासी ने समर्पण कर दिया, और बाबा के पास रहने की इच्छा प्रकट की। एक ही कुटिया होने से, बाबा ने सन्यासी को अपना स्थान दे दिया और स्वयं बिना छत के चबूतरे पर धुने के पास रात्रि व्यतीत करते और दिन भर जनता की सेवा में लगे रहते। उस सन्यासी को स्नान के लिए गर्म जल रखते और खुद नदी में जाकर डुबकी लगाते। अपने शरीर की सेवा के लिए वह कभी किसी भक्त को तनिक भी कष्ट नहीं देते। यहां तक कि उनका दिन भर का भोजन, जंगली पत्रों का साग और कभी-कभी मक्की के भुने हुए दाने मात्र ही होता। अगर कभी कोई भक्त-दाल-चाबल-आटा ले आता तो वह पका कर भक्तों में ही बांट देते। कभी उन्हौंने अपने लिए कुछ रखा हो कदापि नहीं। संचय वृति तो उन्हैं छू भी नहीं गई थी। परन्तु माधवानन्द सन्यासी को बाबा की यह दान बृत्ति अच्छी नहीं लगी। वह अपरिग्रह भाव को नहीं जानते थे। उन्हैं संभवतः स्वार्थ वृत्ति ही अच्छी लगती थी। अतः वह धीरे-धीरे संचय करने लगे। लेकिन बाबा के पास जो भी जाता, वह खाली हाथ नहीं लौटता था, बाबा भीतर से सामग्री निकाल लाते और भक्तों में बांट देते। अब सन्यासी को लगा, इस तरह बाबा के साथ रहना कठिन हो जाएगा और स्थान छोड़ कर चले जाने से, इतनी सुविधाऐं अन्यत्र कहां मिलेंगी। छह महीने बीत गये, तब सन्यासी ने बाबा से कहा- महाराज आप तो सर्वशक्तिमान हैं, आप तो ऐसे-ऐसे कई मन्दिर बना सकते हैं। आप यह मन्दिर मुझे दे दीजिए, और स्वयं दूसरा स्थान ढूंढ लीजिये। "दानबीर बाबा " को कुछ बुरा न लगा। उन्होंने कहा "जैसी आपकी इच्छा।" और बाबा स्थान छोड़, सढ़क के किनारे आ बैठे।बाबा जानते थे, कि यह सब कुछ ईश्वर का है, मेरा क्या है। तेरा-तेरे अर्पण। सायंकाल बाबा के भक्तों को पता चला तो वह आग बवूला हो उठे। उस समय उनके भक्तों की संख्या बढ़ चुकी थी। विपिन सूद नाम के एक भक्त ने कहा-महाराज ऐसा न होगा। हम मन्दिर में जायेंगे और सन्यासी को निकाल बाहर करेंगे, आप भी चलिये। बाबा ने देखा, भक्तों को क्रोध आ गया है। उनको शान्त करते हुए कहा, "बाबा ने दान में दे दिया है। अब बाबा वापिस वहां नहीं जायेगा। चलो दूसरा स्थान देखते हैं।" अब दूसरा स्थान तलाश करते-करते बाबा वहां आकर बैठ गये जहां आज कल त्रिमूर्ति का मन्दिर है। भारी चट्टान के नीचे से कुछ मिट्टी-पत्थर निकालकर, ऊबड़-खाबड़ भूमि पर आसन लगा लिया और जनता जनार्दन की सेवा आरम्भ हो गई। 'जहां चाह, वहां राह' अब और ज्यादा भक्त इकट्ठे होने लगे। सत्संग, अखण्ड पाठ, कीर्तन भजन आदि होने लगे। बाबा जनता-जनार्दन की सेवा मन-चित्त, प्राण से करते और जनता भी बार-बार उनके पास आना चाहती भक्त वत्सल भगवान तथा जनता का प्रेमपूर्वक संगम हुआ। कुछ नवयुवक विशेष रूची और उत्साह से इनके पास रात्रि भी ठहर जाते थे।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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