Chapter 1.21

नवधा भक्ति
श्री महाराज जी को शवरी की नवधा भक्ति से अतिशय प्रेम था। वह कई बार शबरी का प्रसंग सुनाते और उनके निजी दैनिक जीवन में हमें इस नवधा भक्ति के दर्शन होते।
प्रथम भक्ति संतन्ह कर संगा, दूसरी रति मम कथा प्रसंगा।
गुरूपद पंकज सेवा तीसरी भक्ति अमान,
चौथी भक्ति मम् गुनगुन करई कपट तजि गान।।
मन्त्र जाप मम् दृढ़ विश्वासा, पंचम भजन सो वेद प्रकाशा।
छट दम सील विरति बहु करमा, निरत निरन्तर सज्जन धरमा।।
सातवं सम मोहि भय जग देखा, मोते संत अधिक करि लेखा।
आठव जथा लाभ सन्तोषा, सपनेहुं नही देखई परदोषा।।
नवमं सरल सब सन छल हीना, मम भरोस हिय हरष नदीना।।
नव महुं एकऊ जिन्ह के होई, नार पुरूष सचराचर कोई।
सोई अतिसय प्रिय भामिनी मोरें सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।
भगवान श्री राम शबरी के आश्रम में गये और नवधा भगति कह सुनाई।"पहली भक्ति है संतो का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंगों में प्रेम, तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरू के चरण कमलों की सेवा। और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करे। मेरे मन्त्र का जाप और मुझ में दृढ़ विश्वास-यह पांचवी भक्ति है जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुत से कार्यों से वैराग्य और निरन्तर संतपुरूषों के धर्म में लगे रहना। सातवीं भक्ति जगत भर को समभाव से मुझ को ओत-प्रोत देखना और संतो को मुझ से भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए उसी में सन्तोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को ना देखना। नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपट रहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और विषाद का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री- पुरूष, जड़-चेतन कोई भी हो -मुझे वह अत्यन्त प्रिय है।
श्री महाराज ने स्वयं नवधा भक्ति धारण करके अपने देश-जाति और समाज को पुनः इस पर अग्रसर होने का बल दिया है। चैतन्य महाप्रभु सदृश श्री महाराज जी अपनी अनुरागात्मक भक्ति को हृदय के अन्तरतम कोने में छिपा कर सदैव निष्काम कर्मयोग में लगे रहते थे। स्थूल दृष्टि से देखें तो ऐसा लगता था मानो एक साधारण व्यक्ति ही कार्य में तन-मन की लग्न लगा कर बैठा है। लेकिन जब थोड़ा गहराई में जायें तो भेद स्पष्ट मालूम हो जाता था कि श्री महाराज जी के कर्म के पीछे भक्ति का पुट है। भक्ति हुए बिना निष्काम कर्मयोग कभी नहीं हो सकता। इसलिए श्री महाराज जी के निष्काम कर्मयोग की मूल भीत भक्ति ही रही है। हे सांसारिक प्राणियों -हमें भी भगवत् भक्ति प्राप्त करने के लिए व्याकुल रहना होगा और भक्ति प्राप्त करके निष्काम सेवा में जुट जाना चाहिए। इस तरह जब भक्ति और कर्म का सुन्दर समन्वय होता है- तो ज्ञान का प्रकाश स्वयं ही हो जाता है। विवेक और वैराग्य अपने आप में साधना हैं। आत्मोद्वार के लिए ज्ञान का प्रकाश अवश्य चाहिए। कई बार गलती यों होती है कि हम बिना भक्ति के कर्म की दीवार खड़ी करना चाहते हैं। यह बालू की भीत की तरह शीघ्र ही गिर जाती है, ज्ञान के प्रकाश का समय ही नहीं मिलता। इसलिए भगवद् भक्ति ही एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा हम निष्काम कर्म करते हुए ज्ञान के प्रकाश में अपना आत्मदर्शन कर पाते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि भक्ति के बिना ज्ञान व कर्म अधुरा है।
१९७० से १९७४ तक भक्ति का प्रवाह अविरल रहा। तथा साथ-साथ हुई कर्म की साधना। १९७४ के अन्त में ज्ञान का प्रकाश हुआ और मां से घर तथा नौकरी सदा-सदा के लिए छूट गये।
अब हम उन यात्राओं का संक्षेप में वर्णन करेंगे जो श्री महाराज जी ने अपने भक्तों तथा मां के लिए विशेष रूप से की हैं। प्रथम यात्रा का संक्षेप विवरण हम देख चुके हैं, अक्तूबर १९६९ में 'वृन्दावन की यात्रा' का। अब हम अप्रैल १९७० की मां वैष्णुदेवी की यात्रा का वर्णन संक्षेप से लिखेंगे।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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