Chapter 1.2

महादेवी तीर्थ के सन्त जिन्हैं अभी तक हम वैष्णु देव बाबा के रूप में देख रहे थे, सन्त उन्नीस सौ तिरसठ(१९६३) के लगभग अन्त में आखाड़ा बाजार कुल्लू स्थित, शिव मन्दिर, पीपल के चबूतरे पर प्रकट हुए। इससे पूर्व उनका कोई परिचय नहीं मिला है। इस चबूतरे पर बैठे बाबा ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय करते हुए अपनी दिनचर्या पूर्ण करते थे। सर्दियां आरम्भ हो गई थीं, बाबा एक पतली चद्दर और थोड़ी सी लकड़ियों के धुने के सहारे रात-दिन इसी खुले चबूतरे पर बिराजे रहते। अभी भक्तों ने भी इनकी महिमा नहीं पहचानी थीं। अतः भोजन आदि की भी कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। एक पण्डित (श्री राम जी) जो बहुधा आते-जाते इन्हैं इस स्थिति में देखते थे, एक दिन इनके निकट गये और प्रणाम करके पूछा, "महाराज आपके भोजन आदि का क्या कुछ प्रवन्ध होता है?" श्री महाराज ने निर्लिप्त भाव से कहा, "भोजन का क्या है? मिल गया तो खा लेता हूं। और भगवत कृपा से पण्डित जी के माध्यम से बाबा के भोजन का प्रबन्ध होने लगा। अड़ोस- पड़ोस व दूर की मातायें भोजन पकाकर बाबा के लिए बड़े प्यार-दुलार से लाती और बाबा भी वात्सल्य भाव से इस भोजन का अंश मात्र ग्रहण करके शेष अन्य साधु-सन्तों में बांट देते। बाबा का कहना था कि, 'कभी-कभी अन्न और सब्जियों के ढेर लग जाते', और हर मां की इच्छा रहती थी कि बाबा इनका पकाया भोजन ग्रहण करें।

बाबा प्रातः ३ बजे के लगभग उठकर ब्यास नदी में स्नान आदि करके, पीपल के चबूतरे की सफाई करते, गोबर से लीपते और फिर मन्दिर मे पूजा करते। एक भक्त महिला-(विद्यासागर के माता जी- जो अभी जीवित हैं) का कहना है का कहना है कि 'बाबा की भाव भक्ति देखकर वह दंग रह गई। एक बार प्रातः कालीन आरती के समय बाबा भक्ति में इतने लीन हो गये कि उनके नेत्रों से आंसुऔं की धारा बहती हुई उनके चरणों तक को छू गई। फिर भी उनका मन व प्राण प्रभु-अर्चना में तल्लीन रहा। लेकिन बाबा की वह भाव भक्ति गुप्त रूप में ही रही। बहुत ही कम भक्तों को सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा, यह सब देखने का। बाबा जी अपनी भाव भक्ती को प्रायः गुप्त ही रखते थे। भक्ति का दिखावा तो उन्हैं छू तक नहीं गया था। उन दिनों आस-पास में नल नहीं थे। गर्मी के दिनों में बाबा व्यास नदी से पानी भर लाते और सड़क में आने-जाने वालों को जल पिलाते। गर्मी में लोग ठण्डा जल पीकर चैन की सांस लेते। जल पिलाते हुए जनता के प्रति इनकी सेवा जनार्दन की सेवा ही थी। मन्दिर को वह सदा स्वच्छ बनाये रखते। आने-जाने वाले भक्तों को चाय, दूध पिलाते। पूर्णमासी और एकादशी को वह रात्रि भर अखण्ड कीर्तन करते। इस कीर्तन में अड़ोस-पड़ोस के लोग भी सम्मिलित होकर लाभ उठाते।

इन्हीं दिनों ईश्वरी जी, जो किशोर अवस्था में थे, उनके पास आया करते, पास की एक दुकान में कपड़े सिल कर रोजी चलाते थे, उन्हैं बाबा बहुत प्यार से बिठाते और माखन चोर कहकर पुकारते। ईश्वरी जी का कहना है कि बह बाबा के प्यार में बन्ध गये कि उन्हैं बाबा को देखे बिना चैन नहीं आता था। घर में पिता का अभाव होने से कई प्रकार की उलझनें बनीं थीं, परन्तु वह बाबा के प्रेम में सब कुछ भूल गये। श्री डीनू राम (जो पुलिस कर्मचारी हौने के नाते आखाड़ा बाजार में कार्यरत थे।) का कहना है कि, मैं प्रतिदिन जब काम पर आता तो चबूतरे पर, आसन जमाये, बाबा को देखता रहता। एक दिन अचानक बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया, मैं उनके पास जा बैठा तो बाबा ने कहा-'दूध पियोगे?' मैंने जबाब दिया, 'बाबा आप क्या दूध पिलायेंगे? मैं आपको दूध पिलाता हूं.............'पर वाक्य पुरा हौने से पहले ही बाबा ने दूध का गिलास मेरे हाथ में थमा दिया और दूध पीकर मुझे ऐसा लगा मानो आज अमृत पी लिया। बस फिर क्या था, मैं रोज बाबा के पास जा बैठता सत्संग होता, और दूध पीकर चुपचाप आ जाता।

लाला साधुराम खैरा जी (जो मन्दिर के कैशियर हैं) उनकी प्रथम भैंट बाबा से वहीं पर हुई थी। वह कहते हैं कि बाबा जी कभी किसी से कुछ नहीं मांगते थे, सर्दी के दिनों में भी टाट-बोरी की बनी कुटिया में, सर्दी सहन करते हुए, जन-सेवा में लगे रहते। उन्हौंने कभी भी किसी से, लकड़ी, कोयला, अथवा कपड़े की मांग नहीं की। नंगे बदन, केवल एक लंगोटी और सूती चद्दर औढ़े हुए कड़ाके की ठण्ड में सेवारत रहते। कई बार भरी सर्दी के कारण उनका शरीर ठण्डा भी हो जाता था परन्तु उनका भाव तथा कर्म प्रभु के श्री चरणों में अर्पित था। ईश्वर अपने ऐसे भक्त की संभाल प्रायः कर लिया करते हैं। ऐसे समय में कोई भक्त लकड़ी लाता और कोई बिस्तर, कम्बल आदि लाकर बाबा के ठण्डे शरीर को गर्म करने का प्रयत्न करते। भक्त का श्रेय और प्रेम स्वयं भगवान ही देखते हैं, जिसकी उस पर सच्चे दिल से आस्था बनी रहती है। कई राधा स्वामी मतावलम्बी भी उनकी सेवा में घिरे रहते और सत्संग करते।



 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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