Chapter 1.16

गीता की दुविधा
एकान्त आश्रम का संघ-सत्संग दौलत राम सूद के घर होता था, पर उन्हौंने वहां से सत्संग उठाने के लिए कह दिया तो दूसरा कमरा तलाश करना मुश्किल हो गया था। उस समय गीता ने बाबा जी से बात की थी, तो बाबा जी ने अपमे भक्त 'श्याम' के यहां एक कमरा गीता को सत्संग कराने के लिए दिया था। प्रतिदिन का सत्संग गीता कराती और हर रविवार को संघ सदस्य भी आते। सत्संग भवन के मन्दिर में 'सर्वांगी विकास संघ' की पट्टिका लगी हुई थी जो बाबा जी को पसन्द नहीं था। अब बाबा जी हठ करते कि इस पट्टिका को उतार दो। पर गीता को बहुत कठिनाई अनुभव हुई कमरे के बाहर ही-'माता शारदा की जय' की पट्टिका लगा दी गई। गीता को संघ को तिलांजली देना कुछ अटपटा लग रहा था। वह सोचती, कि अगर संघ छोड़ दिया जाए तो उसके पास शेष क्या रह जाएगा? बाबा के भक्तों ने तो कोई ऐसा कार्यक्रम चालू नहीं किया क्योंकि गीता ने एक वर्ष में वहां पाया था कोरा बुद्धीवाद। हृदय की व्याकुलता को अन्तरम् के एक कोने में छिपाकर गीता रात-रात उनीन्दी रहती।
उसे तो साकार प्रभु प्राप्ति की लालसा थी। तर्क-वितर्क, पढ़ाई- लिखाई, भाषण-प्रवचन, परीक्षाएं देना आदि सब कुछ करते हुए भी गीता का मन संघ के किसी कार्यकलाप में नहीं लगता था। कभी- कभी उसका हृदय चीत्कार कर उठता "क्या यह जन्म ऐसे ही व्यतीत होगा। या प्रभु प्राप्ति होगी?" पर सरल हृदया गीता कभी भी संघ के अधिष्ठाता अशेष-चैत्नय से यह प्रश्न न करती। इन दिनों एक ओर तो बाबा वैष्णु देवी वाले प्रतिदिन घर आते और गीता को मां शारदा कहकर सम्बोधित करते हुए उसका विश्वमातृभव जागृत करने का प्रयत्न कर रहे थे। दूसरी ओर गीता आन्तरिक व्याकुलता रहते हुए भी-बाबा की आन्तरिक साधना को नहीं जान पाती भले ही उसका अन्तरतम उसे सुदूर की गहराइयों में ले जाकर शान्ति प्रदान करता था। अब धीरे-धीरे गीता का झुकाव 'माता' की ओर मुड़ने लगा। पर संघ में जो प्रवेश ले रखा था, उसे त्याग कर 'क्या करें' का प्रशन भी पैदा होता। कई बार हृदय आबाज देता "छोड़ दे संघ को।" लगभग फरवरी १९६९ से नवम्बर १९७० तक का समय इस प्रकार दे संघर्ष में निकला।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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