Chapter 1.15

सुश्री गीता जी की बाबा से प्रथम भेंट- बाबा का प्रभाव
फरवरी १९६९ की बात है रविवार के दिन व्यासा मोड़ पर गीता को बाबा के दर्शन हुए। बाबा नंगी धरती पर, नंगे बदन, अवधूत अवस्था में थे। विमला ने बाबा को प्रणाम किया तो गीता के भी दोनों हाथ जुड़ गये। विमला ने कहा- "बाबा जी, चलो हमारे घर चलो," क्योंकि जब यह देवदूत आखाड़ा बाजार में रहते थे तो उस समय विमला इनके पास आती जाती थी। इनका घर पास ही था। विमला के कहने के पश्चात जब गीता ने कहा, "महाराज, हमारे घर पर भी आइए।" तो प्रत्युत्तर मिला आऊंगा, बाबा आपके घर वीरवार को आयेगा।" घर पहुंचने पर गीता ने बाबा के आगमन के बारे, अपनी मां को तथा भाइयों को बताया। वह लोग खुश हुए। गीता को दो दिन पूर्व शुक्रवार शिवरात्रि के दिन स्वप्न हुआ था। स्वप्न में एक मन्दिर में पीपल के वृक्ष के नीचे इसी बाबा को देखा था। जैसे ही गीता ने बाबा के चरण स्पर्श किए, उसी क्षण आकाशवाणी हुई कि "इन्ही महात्मा से तेरा कल्याण होगा। यह कल्युग के एक बड़े महात्मा हैं।" इसलिए भगवत् प्राप्ति के हेतू गीता ने बाबा को पकड़ कर आग्रह किया कि वह गीता को ऐसा आशिर्वाद दें कि उसे भगवान के दर्शन हों। आग्रह करने पर बाबा ने, गहरे लाल रंग का सहसन्दल कमल गीता के हाथ में आशीर्वाद स्वरूप दिया। स्वप्न टूटने पर गीता को लगा कि यह सब सच है, और वह भगवत भक्ति में अधिक आन्नद लेने लगी। शुक्रवार, शनिवार, दो दिन पश्चात उसी बाबा के दर्शन हुए और वीरवार वह बाबा घर पर भी पधारे। उन दिनों गीता-श्री राम-कृष्ण लीला प्रसंग पढ़ रही थी। बाबा की प्रतीक्षा करते हुए दिन के दो बज गए। गीता ने पाठशाला से अवकाश ले लिया था ताकि बाबा और उनके भक्तों की सेवा कर सके। मां के आनन्द का ठिकाना न था, उन्होंने आस- पड़ोस में भी बुलावा दिया था कि सब लोग बाबा के दर्शन के लिए आयें। कुछ महिलाएं और बच्चे आंगन में बैठे हैं। सबकी नजरें मुख्य द्वार की ओर हैं। लगभग तीन बजे बाबा बड़े-बड़े पग भरते आंगन की ओर आते दिखाई दिए। उनके पीछे कुछ भक्त जन भी थे। सब बाबा के सत्कार के लिए आगे बढ़े। गीता भी पुस्तक छोड़कर आंगन में तुलसी के चबूतरे के पास आई तो बाबा साष्टांग प्रणाम करने के लिए 'गीता के चरणों' में एकाएक गिर पड़े। सब हैरान थे। गीता को बड़ी लाज आई कि क्या कर रहे हैं यह बाबा। आस-पास तथा घर के लोग क्या कहैंगे?" फिर दोनों हाथ जोड़कर, सामने खड़े होकर बाबा स्तुति करने लगे। अब धीरे-धीरे उन्हैं, घर के भीतर ले जाया गया सामने मेज पर "श्री राम-कृष्ण लीला प्रसंग" पुस्तक थी। बाबा ने पस्तक मांगी और श्री रामकृष्ण देव के दर्शन करते ही उन्हैं समाधि लग गई। उनके भक्तों ने प्रयत्न किया कि वह समाधि अवस्था से सामान्य अवस्था में आयें। अब भक्तों को प्रसाद बांटा गया। भक्त लोग अपने-अपने घर वापिस चले गये, पर बाबा उठे और गीता के पूजा के मन्दिर में जा बैठे। पांच बज गये बाल-गोपाल आ गये। उन दिनों गीता 'बाल-गोपाल' आध्यात्मिक संस्था चला रही थी। इसलिए बाबा को यों ही छोड़कर सत्संग चलाने चली गई। सात बजे आकर देखा- बाबा तो जमीन पर ही लेटे हैं। सिर -'बाल रूप श्री राम' की मूर्ती की ओर है। गीता आई ज्योति जगाई, आरती की। आरती का शब्द सुनकर बाबा उठकर बैठ गये, "मां आप मुझे चरणामृत दो।" गीता कुछ न समझी। बाबा ने गीता की मां से कहा "जल ले आओ, और एक परात भी।" आज्ञानुसार एक भक्त जल और परात ले आया, लेकिन गीता ने कहा- "यह कैसे होगा महात्मा जी को मैं अपने चरणों का जल नहीं दे सकती।" पर बाबा के आग्रहपूर्वक यह कहने पर कि बाबा-यहीं शरीर छोड़ देगा गीता के चरण बढ़ आए और बाबा चरणामृत पीकर तृप्त होकर चले गये। गीता भला क्या जानती थी। बाबा फिर आ गये दूसरे दिन और वही आग्रह शुरू हुआ। धीरे-धीरे गीता ने चरणामृत देना आरम्भ कर दिया। हर रविवार गीता आश्रम में जाती प्रातः सायं बच्चों को सत्संग कराती।
बाबा प्रतिदिन गीता के घर आते, कभी-कभी बच्चों के सत्संग में जाकर सब बच्चों के पीछे बैठकर अपनी मां के प्रवचन सुनते। फरवरी १९६९ में गीता आश्रम के सत्संग के लिए दिल्ली गई। बाबा और गीता की मां दोनों नहीं चाहते थे कि वह दिल्ली जाये कयोंकि गीता का स्वास्थय ठीक न था। दिल्ली में 'हिन्दू महासभा' में सम्मेलन था। तीन चार दिन सम्मेलन हुआ। अन्तिम दिन विजय और विश्वनाथ आ पहुंचे, उन्होंने बताया कि बाबाजी, माता जी के साथ आये हैं और पहाड़गंज में हैं। आप को बुला रहे हैं। गीता उनके साथ पहाड़गंज पहुंची। बाबा जी वहां एक राधा- स्वामी भक्त के यहां ठहरे हुए थे। वहां से सब इकट्ठे वृन्दावन गए। बाबा ने स्वयं नंगे पैर चलकर वृन्दावन की महिमा गीता को दिखाई और वहां एक सप्ताह रहकर सब वापिस आ गये। कुल्लू आकर गीता फिर आश्रम जाने लगी। बाबा बच्चों के सत्संग से बहुत खुश थे। पर उनकी इच्छा थी वह स्वतन्त्र होकर करे-किसी संघ के बन्धन या आज्ञा से नहीं। पर गीता के हठ के आगे उन्हैं भी कठिनाई अनुभव होती।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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