Chapter 1.11

श्री डीनू राम (नारायण जी)
श्री डीनू राम, सजला निवासी श्री महाराज जी के अन्तरंग भक्तों में से एक हैं। इनका परिचय हम इस प्रकार पाते हैं। आखाड़ा बाजार में प्रथम भैंट में दूध पिलाकर, उन्हैं यह समझा दिया कि यह बाबा उन्हैं, भव सागर से पार ले जाने की युक्ति बतायेगा। श्री डीनू राम एक जिज्ञासू भक्त होने के नाते किसी गुरू की खोज में थे। बाबा ने एक दिन इनसे पूछा-"आप क्या करते हैं?" उत्तर मिला-"मैं पुलिस में सिपाही हूं।" कहां? "लाहुलस्पिती में।" "आप का परिवार कहां है?" "मनाली के पास एक गांव में।" अब श्री महाराज जी ने कहा- आप सरकारी नौकरी छोड़ दो और अपना घर-बार तथा बच्चों को संभालो। गांव में दुकान खोलकर रोजी-रोटी कमाओ।" श्री डीनू राम जी को लगा कि उन्हैं सदगुरू मिल गये हैं। और आज्ञा पालन करते हुए नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। श्री महाराज इन्हैं नारायण कहते और जब इनकी धर्मपत्नी आती तो उन्हैं लक्ष्मी कहते। डीनू राम जी भक्तों में नारायण के नाम से ही प्रसिद्ध हैं। अतঃ अब हम उन्हैं 'नारायण' शब्द द्वारा ही बोधित करेंगे। नारायण जी का भाव श्री महाराज जी के प्रति अनन्यतम रहा। श्री महाराज जी की आज्ञा का पालन ही उनके लिए जीवनधर्म था। कब किस प्रकार की आज्ञा हो जाएगी कौन जाने? और नारायण जी भी सदा तैयार रहते कि जैसी भी आज्ञा होगी अवश्य पालन करूंगा। अब मन्दिर निर्माण कार्य के लिए श्री महाराज जी, नारायण को कई प्रकार की आज्ञा देते, कभी लकड़ी चाहिए और कभी अन्न। गीता भवन निर्माण में जितनी भी लकड़ी लगी है, सबका उत्तरदायित्व नारायण को सौंपा गया था। जब कभी कोई तीर्थ यात्रा करनी हो तो भी नारायण को आज्ञा हो जाती कि बाबा को यात्रा करवाओ। नारायण आव देखता ना ताव और झट से यात्रा के लिए तैयारी करता, जबकि साथ ही नारायण जी का कहना है कि "मेरे लिए सब तीर्थ श्री महाराज जी के चरणों में ही हैं।
नारायण कहा करते -'मुझे किसी प्रकार की इच्छा नहीं है। यहां तक कि स्वादिष्ट भोजन खाने की भी नहीं। कई बार अगर दाल में नमक न हो, तो नारायण दाल-भात खाकर उठ जाते, लेकिन यह न कहते कि दाल में नमक नहीं है। अतঃ सादा जीवन व्यतीत करते हुए उन्हैं बस श्री महाराज जी के लिए ही जीना है। घर में भले ही आग लगी हो, पर अगर श्री महाराज जी की आज्ञा हो-"चलो नारायण" तो नारायण साथ ही चल पड़ता" आगे-पीछे कुछ देखने-सुनने की आवश्यकता ही नहीं। श्री महाराज जी नारायण की इस आनन्य श्रद्धा -भक्ति और विश्वास से प्रसन्न थे। नारायण का कहना है, " एक बार में बिमार पड़ गया। सर्दी का मौसम था। चारों ओर बर्फ पड़ी थी। मेरा मन रह-रहकर मन्दिर की ओर चला जाता, पर बुखार होने से मैं इतना निर्बल हो गया था कि चल फिर नहीं सकता था। भारी बर्फ गिरने से बस सेवा भी बन्द थी। जब बीस-बाईस दिन हो गये तो क्या देखा कि श्री महाराज जी, नंगे पांव, नंगे बदन, हाथों में लाठी लिए हुए, अकेले ही पैदल चलकर हमारे घर सजला गांव में पहुंच गये। एक दिन घर में ठहरकर दूसरे दिन मुझे अपने साथ ही मन्दिर में ले आये मन्दिर में ले आकर गर्म विस्तर, अंगीठी आदि सब प्रबन्ध किया और गर्म-गर्म दाल फुलका, चाबल आदि बड़े प्यार से खिलाते रहे और मैं कुछ ही दिनों में पुनঃ स्वस्थ हो गया। यह सब देखकर में निर्वाक रह गया कि किस किस प्रकार, जिनकी आज्ञा का पालन करने के लिए मैं आतुर रहता था, वही अब मेरी बीमारी में मां का दुलार प्यार देकर रात-दिन सेवा में लगे हैं।" नारायण जी भी मां जनजननी के रसददारों में से एक हैं। आज तक नारायण जी श्री महाराज जी के श्री चरणों की सेवा में तन-मन से लगे हुए हैं।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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