Chapter 1.1

नर की नारायण रूप में सेवा करने से नर स्वयं ही नारायण बन जाता है।
अनादि काल से चला आने वाला सनातन धर्म विश्व के आगे प्रस्तुत करता है कुछ सनातन सिद्धान्त जैसे सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य। सेवा, दया, त्याग, करूणा से मानवीय मूल्यों की सुरक्षा व सनातन धर्म का प्रचार करने के लिए इस पृथ्वी पर संयोग से कभी-कभी महापुरूष अवतरित होते हैं, और स्वयं अपने जीवन में उन सिद्धान्तों व मूल्यों का परीक्षण तथा पोषण करते हैंवेद-उपनिषद भगवद् गीता, रामायण व अन्य धार्मिक ग्रन्थों की शिक्षायें, पूर्णतया जीवन में धारण करके यह महापुरूष आने वाली सहस्त्रों पीढ़ियों का मार्ग दर्शन कर जाते हैं। जीवन पर्यन्त कठोर तप, परिश्रम, संघर्ष, सेवा त्याग, बलिदान द्वारा एक प्रकाश स्तम्भ की प्रस्थापना करके इसका स्वरूप समय की मांग के अनुसार बनाते हैं। प्रवचनों, लेखों, मन्दिरों व तीर्थों जैसा निर्माण कार्य करके अपने परीक्षणों और अनुभवों को जन-साधारण तक पहुंचाते हुए महापुरूष इस धरा से ब्रह्मलीन हो जाते हैं। लेकिन छोड़ जाते हैं एक सुलभ मार्ग-जिस पर जन-साधारण आगे बढ़ सकता है।
ऋषि-मुनियों, राम कृष्ण अवतारों, बाल्मीकि व सन्त तुलसीदास आदि महाकवियों, महात्मा बुद्ध, भगवान परमहंस और स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरूषों की भान्ति इस धरा पर (भारत की बायण्य दिशा) देव भूमि कुल्लू मैं भी एक ऐसे महापुरूष का प्राकटय हुआ, जिसने अपने जीवन के अन्तिम चौबीस बर्षों, सनातन धर्म को पुनः जागृत करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करके अपने निजी जीवन द्वारा सिद्ध कर दिया कि इन्सान की ईश्वर रूप में सेवा करने से मनुष्य स्वयं ही भगवान बन जाता है। सत्य, अहिंसा अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अस्तेच की यह प्रतिमूर्ति करूणा, दया, सेवा, वात्सल्य, ज्ञान, भक्ति व कर्म से विभूषित होकर जन साधारण के दिलों की गहराइयों में जा बेठी और परिणाम यह हुआ कि जनता में जनार्दन (भगवान) के दर्शन करने वाला यह महापुरूष, बाबा वैष्णुदेवी के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए। बच्चे, बूढ़े, नवयुवक, मातायें, हरिजन, दुष्ट-पापी, दीन-दुःखी, अमीर-गरीब जो भी इनके निकट सान्निध्य में आया वह सदा-सदा के लिए इनका बन गया। सबके मन में इच्छा रहती कि बढ़िया से बढ़िया वस्तु जिसका वह स्वयं प्रयोग करते हो पहले बाबा को निवेदित करें। भक्तों को, बाबा को भोग लगाकर खाने में बड़ा आनन्द आता, लेकिन करूणानिधि, भक्त वत्सल बाबा भक्तों के अर्पित भोग- प्रसाद, नाम मात्र के लिए ग्रहण करते, फिर उठा-उठाकर भक्त जनों के मुंह में डालकर आनन्द विभोर हो जाते और उनके मुख-मण्डल की आभा से साफ-साफ लगता कि बाबा को उस दिव्य आनन्द की अनुभूति हो रही है जो भक्त अपने भगवान की तुष्टि में अनुभव करने लगता है। कई बार मैं स्वयं भी इस दिव्य आनन्द की अनुभूति से अवाक् रह जाती और मेरा हृदय भाव विभोर हो उठता। यही है भक्त वत्सल भगवान। बाबा ने सेवा शब्द की व्याख्या शब्दों में न करके विभिन्न प्रकार की सेवाओं को जनता जनार्दन के प्रति अर्पित करके सेवा शब्द इतना विस्तृत कर दिया है जिसके विषय में यहां कुछ प्रसंग होना आवश्यक हो जाता है। बाबा के बारे में जन साधारण की यह आस्था थी कि दिव्य शक्ति धारण करने वाला यह पुरूष छूने मात्र व आशीर्वाद से हमारे दुःख दर्दों को दूर कर सकता है। इसलिए जनता अपने दुःख दर्द लेकर बाबा के पास आती और बाबा भी किसी का दुःख स्पर्श मात्र से, किसी को चरणामृत देकर, किसी को विभूति देकर हर लेते और बुद्धिजीवी जनता को बाबा 'राम-राम' का जप सबसे उत्तम औषधि बताते। कभी नंग-धड़ंगे भिखारियों को देखकर वह अपने शरीर पर धारण की हुई एकमात्र चादर को भी उसे देकर सुख की अनभूति करते। वह कहा करते थे "मांगने पर भिक्षुक को देना श्रेष्ठ है किन्तु बिना मांगे स्वयं भिक्षुक की खोज करके देना श्रेष्ठतर है।"
जैसे चुम्बक लोहे को आकर्षित करता है ऐसे ही बाबा का व्यक्तितव तथा प्रेमभाव जनता के मन को आकर्षित करता रहता। त्रिगुणात्मक सृष्टि में सज्जन,दुर्जन, साधु-असाधु, अमृत- विष सभी कुछ विराजमान है। कुछ दुषित व नीच प्रवृति के लोगों को बाबा को दुःख देकर आनन्द लेना बहुत अच्छा लगता था और कुछ उनके दृढ़ संकल्प में बाधा डालकर सुखी होते थे। परन्तु जब भी ऐसे लोग आते तो बाबा उनकी सेवा उसी भाव से किया करते जैसे वह अपने भक्तों की करते। ऐसे लोगों को विशेष रूप से दूध पिलाते और फल आदि खिलाते व अपने दिव्य भाव से उनके मन को सही दिशा में लाने का प्रयत्न करते। ताकि वह दुर्जन, मानव जीवन का सही प्रयोग करें।
"वदऊं संत असज्जन चरणा।
दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।।
भलो भलाइहि पै लहई,लहई निच इहि नीचु।"
सुधा सराहिऊं अमरतां गरल सराहिय मीचु।।"
भला, भलाई ही ग्रहण करता है। और नीच नीचता को ही। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में। बाबा इस प्रकार सर्वत्र सदा दूसरों की भलाई में लगे रहते और कई दुष्ट इनका संग पाकर शिष्ट बन गये। बहुतों को इनसे मार्ग दर्शन मिला। तुलसीदास जी के शब्दों में संत की जो व्याख्या हुई है, वह पूरी तरह बाबा के पवित्र जीवन को दर्शाती है।
जड़ चेतन गुण दोषमय, विश्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहि पय, परिहरि बारि विकार।।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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