शिवलिंग की चोरी

प्रिय पाठकगण !
मेरी आत्मकथा में कई आलौकिक घटनाओं को पढ‍़ने का सुअवसर प्राप्त होगा । इस मायामय संसार से परे(लोकातीत) परम शक्ति है । उसी परम शक्ति को हम ब्रह्म, ईश्वर, भगवान कहकर पुकारते हैं । ' एकं सत्य विप्रा बहुदा बदन्ति ' एक ही के भिन्न-भिन्न रूप से व्याख्या की है । वह परम शक्ति ही  कई रूप में प्रकट होती है -सर्वशक्तिमान जगत जननी के रूप में, सृष्टि कर्त्ता के रूप में, जगत पालक भगवान विष्णु के रूप में तथा संहारकर्त्ता भगवान शंकर के रूप में । भक्त अपनी-अपनी रुचि-वैचित्र्य के अनुसार इन स्वरूपों की पूजा-अराधना करते हैं । श्री महादेवी तीर्थ जगत जननी का प्रकट रूप है ।  इस तीर्थ में भगवान शिव का सर्वोत्तम स्थान है यहां आदिशिवलिंग की पूजा होती है । 

 बात सन‍् 1972 की है । उन दिनों मैं साधिका के रूप में प्रातः 5बजे अपने पितृगृह ( आखाड़ा बाजार कुल्लू ) से श्री महादेवी तीर्थ की ओर साधना हेतू जाया करती । इसी बीच रास्ते में नदी के किनारे  मेरे आराध्यदेव श्री श्री महाराज जी द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग था उनकी आज्ञा के अनुसार मैं प्रतिदिन दूध से अभिषेक करके ही श्री महादेवी तीर्थ की ओर प्रस्थान करती सन् 1968 में मेरे आराध्य देव ने 'छिम्बाबाबड़ी ' स्नानागृह स्त्रियों के लिए बनवाया था सड़क के उस पार शिव मन्दिर बनाया । शिव मन्दिर के निचली ओर पुरुषों के स्नान का स्थान था छिम्बाबाबड़ी का जल पर्वतीय होने के कारण मीठा था अतः स्थाई निवासी स्नान करने के साथ-साथ पीने के लिए जल भी ले जाया करते । मैं भी मातृदेवी व बहनों के साथ यदा-कदा स्त्रियों के स्नानागृह में स्नान करने आया करती थी 1969 से मेरा एक भगवत‍् कार्य यह भी हो गया कि शिवलिंग का अभिषेक करके ही अपने आराध्यदेव के दर्शन व मूर्ति-विग्रहों की पूजा करूं।

एक दिन नित्य प्रति की भान्ति प्रातःकाल जा रही थी जब उक्त स्थान पर पहुंची इससे पहले कि अभिषेक(दूध,गंगाजल,फूल-फल, धूप-दीप, अक्षत इत्यादि ) की तैयारी करती मेरी दृष्टि शिवलिंग वाले खाली स्थान पर पड‍़ी । अपने आराधित शिवलिंग को वहां न पाकर मेरे पांव तले जमीन खिसक गई । मैं निराश हो श्री महादेवी तीर्थ की ओर बढ़ी । मेरा मन बार-बार यह सोच रहा था भला क्यों शिवलिंग अदृश्य हुए ? क्या कमी रह गई अभिषेक में ? इतने में ही जगतजननी महादेवी ने मेरी आंखों के सामने एक दृश्य प्रस्तुत कर दिया और बता दिया कि शिवलिंग अदृश्य नहीं हुए वरन‍् संस्कृत के एक विद्वान ने किसी के कहने पर वहां से उठवा दिया है । वह कौन होगा ? किसने यह अपावन कार्य करने को कहा होगा ?

मां भगवती ने उसी समय दोनों दृश्य मेरे आगे प्रस्तुत कर दिए । सोचते- सोचते पता ही नहीं चला कि कब  मैं श्री महादेवी तीर्थ के प्रथम द्वार पर पहुंच गई ।प्रथम सीढ़ी पर प्रणाम कर मैं श्री श्री महाराज जी के समक्ष पहुंची । श्री श्री महाराज जी सिढ़ियों के किनारे बनी छोटी सी कुटिया में विराजमान थे ।उन्होंने मुझे गम्भीर दृष्टि से देखा उस समय वे कुछ सोच रहे थे । उनकी विचारता को भंग करते हुए मैंने कहा,''स्वामी जी ! वहां शिवालय का शिवलिंग गायब हो गया है । मै प्रतिदिन की भान्ति अभिषेक करने गई तो वहां देखा अकेले नन्दी बैठे हैं मैं नन्दी की पूजा करके आ गई ।'' इतना कहते ही श्री श्री महाराज जी ने कहा,'' मम्मी जी ! कोई बात नहीं जब चोर भूख से मरने लगेंगे तो स्वयं ही शिवलिंग को यहां छोड़ जाएंगे ।'' उन्होंने समक्ष खड़े भक्त श्री युत शादीलाल जी से कहा,'' शादीलाल जी ! आप अभी गंगा मैया से शिवलिंग ले आओ ।'' भक्त शीघ्रता सीढ़ियां उतरकर घाट पर जाकर गंगा मैया की गोद से शिवलिंग उठा लाए । श्री श्री महाराज जी ने कहा,'' आप अभी जाओ और वहां इस शिवलिंग की स्थापना कर आओ ।'' भक्त ने आज्ञा शिरोधार्य की । शहर से मिस्त्री बुलाकर उस खाली स्थान पर पुनः शिवलिंग की स्थापना कर दी गई । प्रातःकाल जब मैं घर से आती तो अभिषेक करते हुए सोचने पर विवश हो जाती कि यह कैसी लीला है प्रभु !

एकाएक मुझे पिछली घटना याद आ गई । 1971 जून का महीना था । प्रातःकाल मैं अभिषेक करके श्री महादेवी तीर्थ की ओर गई वापिस आते हुए  मैंने देखा कि संस्कृत का  एक प्रोफेसर अपनी पैंट शिवालय में टांगकर शिव मन्दिर के पास बैठकर मालिश कर रहा था । मुझ उनका यह कार्य उचित नहीं लगा । मैं सड़क से ही सहसा बोल उठी -'' ए प्रोफेसर ! क्या यही स्थान है पैंट को टांगने के लिए । उतारो इसे अभी ।'' मेरी ललकार सुनकर  प्रो० ने पैंट उठा ली ।  यह प्रो० जटाधारी बाबा* का शिष्य था । कुछ समय पश्चात् उस प्रो० का तबादला हो गया । समय बीतता गया । उक्त स्थान पर  आखिर दिसम्बर 1974 में मैं सदा-सदा के लिए श्री महादेवी तीर्थ में अपने आराध।य देव की छत्रछाया में रहने के लिए आ गई । मई 1975 की एक सुबह ॰॰॰॰॰॰॰ जबकि उस समय मेरे आराध्यदेव और मैं ही मन्दिर में रहते । मुझे सभी कार्य स्वयं ही करने होते थे ।

श्री महाराज जी मन्दिर के निर्माण कार्य में संलग्न रहते । हाथ बंटाने के लिए एक मिस्त्री मन्दिर में रहता था । आर्थिक अभाव के कारण मन्दिर में कोई सेवक नहीं था । मिस्त्री दिन के समय शहर जाता और रात्रि में मन्दिर आ जाता । प्रातःकाल मन्दिर में झाड़ू लगाता । मैं प्रातःकाल मन्दिर की सफाई करके पूजा करती । एक दिन पूजा करके महादेवी गुफा से बाहर आई ही थी कि मिस्त्री ने कहा,"माता जी ! शिवलिंग को किसी ने गुप्तगंगा के पास रख दिया है ।" मैंने कहा-" कहां ? शिवलिंग तो भीतर गुफा में है ।" मैं उसे लेकर भीतर गुफा में गई और उसे शिवलिंग के दर्शन करवाए । उसने कहा," आप मेरे साथ नीचे गुप्तगंगा पर चलिए ।" गुप्तगंगा सड़क के किनारे है मैं कुछ सीढ़ियां उतरकर श्री महाराज जी की कुटिया में गई । उस समय श्री महाराज जी बिना द्वार की कुटिया में रहते थे । भूमि आसन  था । साथ ही धूना लगा हुआ था । श्री महाराज जी ध्यानावस्था में थे । पहले मैंने आवाज लगाई फिर हाथ से हिलाया तब कहीं जाकर श्री महाराज जी सामान्य स्थिति में आए ।

मैंने कहा,"स्वामी जी ! मिस्त्री कह रहा है कि गुप्त गंगा पर शिवलिंग रखा हुआ है ।" श्री महाराज जी मुस्कराए और मेरी ओर देखने लगे । श्री महाराज जी के साथ मैं और मिस्त्री  गुप्तगंगा पर गए तो क्या देखा कि सफेद संगमरमर के शिवलिंग को गुप्तगंगा की जलधारा के नीचे बड़े ढंग से रखा हुआ है । श्री महाराज जी के नेत्र सजल हो उठे । उन्होंने झट आगे बढ़कर शिवलिंग को उठाया और हृदय से लगाकर प्यार करने लगे । ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों मां अपने खोए हुए बच्चे को पुनः पाकर गद् गद् हो उठती है । मेरे आराध्य श्री श्री महाराज जी शिवलिंग को पुचकारते,दुलारते हुए सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पीपल के वृक्ष के पास पहुंचे । मैंने भी उनका अनुसरण किया । पीपल के वृक्ष के चारों ओर पत्थर की चौड़ी व नीची दीवार पर शिवलिंग को विराजमान करके श्री श्री महाराज जी  कहा," हे शिवलिंग ! आप सदा-सदा के लिए यहां विराजो ।" आज भी आदि शिवलिंग के दर्शन कर भक्त जन कृतार्थ होते हैं । (परिस्थिति अनुसार आज ये आदि शिवलिंग ऊपर शिवगुफा में विराजमान है ।) दैवयोग से उसी वर्ष विपाशा नदी में बाढ़ आ जाने से गंगा मैया ने शिवालय व शिवलिंग को अपनी गोद में समा लिया । आज उस स्थान पर किसी भी शिवालय  या शिवलिंग के दर्शन नहीं  होते ।
 

मंगलाकांक्षी,
गीता मां 

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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