School of Culture

भारतीय संस्कृति कि आदर्श पाठशाला

श्री महादेवी तीर्थ भारतीय संस्कृति की आदर्श पाठशाला है । भारतीय संस्कृति के सिद्धान्त, नियम, उपनियम, उद्देश्य, आदर्श सभी कुछ इस में समाहित है । भारतीय संस्कृति का उद्देश्य है - मानव जीवन को सार्थक करते हुए भगवान के दर्शन करना । यही जीवन का सर्वोतम उद्देश्य है ।इस उद्देश्य की प्राप्ति केवल मानव योनि में ही हो सकती है ।शेष ८४ लाख योनीयां तो भोग योनियां हैं । शुभ कर्म, परहित, सेवा के कार्य से ही मानव नर से नारायण बन जाता है । शुभ कर्मो के साथ-साथ प्रभु भक्ति का होना अति अनिवार्य है । प्रभु प्रेम बिना कर्म पंगु होता है, प्रभु भक्ति बिना मनुष्य पशु तुल्य हो जाता है । प्रभु भक्ति में निःस्वार्थ भाव का होना नितान्त आवश्यक है ।सेवा करते हुए किसी प्रकार कोई शर्त नहीं । ऐसी सेवा निष्काम कर्मयोग बन जाती है और भक्त निष्काम सेवा के पुष्पों से प्रभु की पूजा करता है ।  श्री महादेवी तीर्थ में भक्ति-भाव के उद्दीपन के लिए सनातन धर्म के सभी मूर्ति-विग्रहों की प्रतिष्ठा, निष्काम कर्मयोग के लिए दैनिक अन्नसत्र, गऊ सेवा-सदन, निःशुल्क औषधालय (गत ४० वर्षो से सभी कार्य किए जा रहें हैं । ज्ञान को बढाने के लिए पुस्तकालय व अध्यात्म सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है । वैदिक संस्कृति में यज्ञ-हवन का बहुत महत्व है-
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यान्नसम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः।। (श्री मद्भगवद्गीता ३,१४)
श्री महादेवी तीर्थ में यज्ञ-हवन नित्य प्रति होते हैं । यज्ञ-हवन से वातावरण शुद्ध होता है । वातावरण के शुद्ध से मानसिक पवित्रता आती है । भक्त सभी में भगवान  के दर्शन करता है । अर्थात पूरे विश्व में भगवान का विराट स्वरूप को देखकर प्रसन्न होता है । तीर्थ स्थल में आने वाले सभी जन एक समान है । सभी को समान रूप से आदर-सत्कार मिलता है । समभाव से  जीने वाला जीवन ही योग कहलाता है । 'समत्व योग न उच्यते '। हृदय तथा मन में को समभाव में लाने के लिए युगों- युगों तक तपस्या की जाती है। यहां के कर्म व वातावरण मनुष्य के मन में समभाव लाने के लिए सार्थक है । यहां आने वाला प्रत्येक मनुष्य चाहे वे किसी की धर्म, मत, वर्ण, जाति व आश्रम का हो ऊसे समभाव की प्राप्ति हो जाती है ।
भारतीय संस्कृति की इस अनूठी पाठशाला में निम्नलिखित पांच सूत्रों का प्रयोग किया जाता है -
१) मानव जीवन का उद्देश्य - प्रभु प्राप्ति ।
२) मानव जीवन का सिद्धान्त - सत्य ।
३) मानव जीवन का धर्म - सेवा ।
४)मानव जीवन का सार - प्रेम ।
५)मानव जीवन का आदर्श - त्याग

भारतीय  संस्कृति में आत्म ज्ञान (self-knowlegde)का बहुत महत्व है । 'मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? मुझे कहां जाना है ? वैदिक साहित्य मे आत्म ज्ञान के विषय में विशद वर्णन मिलता है । आत्म ज्ञान हेतू सद्गुरू महामानव के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । ऐसे महामानव को भगवान स्वयं इस धरा पर भेजते है या स्वयं महामानव के रूप में प्रकट होते है । वर्ष १९६४ में कुल्लू की इस धरा पर ऐसे ही महामानव का प्राकट्य  हुआ । जिन्होंने निज जीवन को चलती-फिरती प्रयोगशाला बना रखा था । वे जानते थे कि उनके पास समय की सीमा है । उस सीमा को पार करने से पूर्व ही इस स्थान पर जहां आज श्री महादेवी तीर्थ है , पर डेरा डाला और अपने आध्यात्मिक  जीवन के प्रयोगों व अनुभवों  को श्री महादेवी  तीर्थ के रूप में प्रकट किया । यह स्थान स्वयं में एक पाठशाला है । प्रत्येक मानव यहां आकर अध्यात्म का कोई भी प्रयोग करके आत्म ज्ञान की प्राप्ति कर सकता है । श्री श्री  महाराज जी का  जीवों के  प्रति  अतीव स्नेह अविस्मरणीय है उनका सान्निध्य पाकर पशु-पक्षी भी धन्य हुए । सभी यहां निर्भय होकर विचरते हैं कोई किसी से द्वेष नहीं करता । सभी अपने कर्तव्य कर्म में उद्धत हैं और अधिकारों के प्रति जागरूक भी ।

पमेरियन प्रजाति का एक छोटा सा पिल्ला जिसे में ' टाईगर ' कहकर पुकारती हूं । वह अपने कर्त्तव्य से भली-भान्ति परिचित है और अधिकार वश मेरी गोद में बैठकर मेरा प्रेम भरा हाथ अपनी पीठ पर रखवाने से नहीं चूकता ।

श्री महादेवी तीर्थ प्रेम का घर है । यहां पशु की नहीं पाश्विक वृत्तियों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) की बलि दी जाती है । वैदिक संस्कृति मानवीय मूल्यों का विशेष स्थान है ।  तीर्थ स्थल की इस पाठशाला में मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हुई है । श्री श्री महाराज जी स्वयं सन्यासी विवेक जी को ' बडा भाई ' व सन्यासी कमाल जी को 'छोटा भाई' तथा मुझे 'माता जी ' पुकारते । भाई-चारे की इस भावना ने उन्हें विश्व-बन्धुत्व में प्रतिष्ठित हुए । तीर्थ में आने वाले सभी भाई-भाई हैं । दया भाव तो यहां का प्राण हैं । सच्चाई व सफाई तो तहां प्रकट रूप में देखने को मिलती है ।
CLEANLINESS IS TO NEXT GODLINESS

इन्हीं मूल्यों को जीवन में धारण कर मनुष्य को आत्म ज्ञान प्राप्त है कि मैं देह नहीं आत्मा हूं, परमात्मा का अंश हूं पुनः उसी के पास जाना है । 'तू और तेरा ही ज्ञान है, मैं और मेरा ही अज्ञान है ।' इस प्रक्रिया का मार्ग महामानव सद्गुरू श्री श्री महाराज जी ने बताया है- जीव मात्र की सेवा । इसीलिए यहां जीव सेवा सम्बन्धित कार्य होते रहते हैं । महापुरूषों की दिनचर्या, क्रियाकलाप, उनके अनुभव मानव जीवन में सहातक सिद्ध होते हैं ।

अहं ब्रह्मस्मि, एको ब्रह्म द्वितीय नाऽस्ति, तत्त्वमसि श्वेत केतू ।
ये महावाक्य मानव को अनुभूति करवाते हैं कि 'तू ही ब्रह्म है ।'
प्रभु सर्वव्यापक है,  प्रभु सर्वशक्तिमान है, मैं उनसे अलग नहीं हूं , मैं उन्हीं का अंश हूं , यह जानना व मानना तदनुसार व्यवहार में  वर्तना ही ज्ञान है ।
मैं आप सबका आवाह्न करती हूं - " आईए ! इस ज्ञान को अनुभव कर आनन्द प्राप्त करें !
' सर्वे भवन्तु सुखिनः ' भावना के साथ 

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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