अमृत कण 9

कल्याणीय......................!आशीर्वाद, आपका पत्र मिला।

मां कृपा। 1970 में परमपूजनीय स्वामी जी अपने कुछ भक्तों के साथ हरिद्वार गये। मैं भी साथ में थी। वह मुझे मातेश्वरी का साक्षात् रूप मानते थे। वैसे तो उनके लिए प्रत्येक मां मातेश्वरी का साकार रूप ही थी। हरिद्वार में उन्होंने पूजा की। मुझे शक्ति, सरस्वती और गंगा का रूप प्रदान किया। उस समय में कुछ न समझ पाई थी। उन्हौंने गंगा का रूप प्रदान करने के पश्चात हाथ जोड़ कर कहा-मां आप पतित पावनी गंगा हैं। आप विना भेद भाव के सब को पवित्र करना। गंगा मैया में सभी नहाते हैं।   मां नहीं देखती-कौन पापी-भ्रष्टाचारी अत्याचारी या पुण्यात्मा है। उन के ब्रम्ह्लीन, होने पर मैं स्पष्ट रूप से देख रही हूं- अनुभव कर रही हूं कि उन के दिये हुए तीनों रूप अपना-अपना कार्य कर रहे हैं। परन्तु गंगा मैया का रूप तो विशेष रूप से उमड़ आया है। हां ,मैं एक ऐसे परिवार से आई हूं जहां प्रेम का राज्य था। और मैं जिनके श्री चरणों में आई वे तो साक्षात प्रेमावतार थे।

प्रेम कली को प्रेम जल से सींचा तो वह प्रफुल्ल हो कर प्रेम बांटने लगी। प्रेम ही तो जीवन है। घृणा तो मृत्यु है। प्रेमी से प्रेम करना कठिन नहीं है। द्वेषों से प्रेम करना साधना है। द्वेषी कौन होता है? जो बिना किसी कारण के दूसरों से वैर करता है। अच्छाई द्वारा बुराई पर विजय पाना ही अध्यात्म है। आत्म दर्शन है। जब सब में-चर-अचर में, घटघट में मेरे भगवान् का निवास है तो बुरा कौन है?

घृणा किससे ? और बिना कारण ही यदि कोई हमसे घृणा से भरपूर व्यवहार करता है तो वह भी भगवत-इच्छा ही समझो।

विकट से विकट समस्याऐं आई  पर भगवत इच्छा जान कर समाधान किया। मेरे इस दरबार में संसार के ही लोग आते हैं और अपने साथ माया का राज्य भी साथ ही लाते हैं। और यहां भी वही कुछ होने लगता है जो संसार में होता है। परन्तु भगवान यहां शीघ्र ही शीघ्र हमें जता देते हैं की हम ने कौन सी गलती की है। उसका प्रायश्चित हमें करना चाहिए। कई तो परीक्षा में सफल होते हैं जैसे आप। सफल परिक्षार्थी अगली परिक्षा की तैयारी में जुट जाता है---------न जाने जीवन में कब क्या होगा? हे पतितपावनि गंगे तू सब को पावन कर दे।

शुभाकांक्षी "गीता मां"

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 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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