श्री महाराज सेवक दास

गरू भाव

दैवी शक्तियों का जिन्हैं सहयोग मिलता है वे व्यक्ति वास्तव में भगवदिच्छा से ही इस संसार में किसी कार्य हेतू आए होते हैं। जैसा स्वामी रामकृश्ण परमहंस कहा करते थे 'भगवदिच्छा से ही कोई प्रचार कर सकता है।' ऐसे व्यक्ति को ही गुरू बनने का अधिकार मिलता है। श्री महाराज ने भले ही किसी को औपचारिक रूप से दिक्षा नहीं दी, अनेक भक्त उनके शिश्य हैं। वे जिस भी व्यक्ति को पात्र समझते उसे अपनी ओर आकर्षित करते और वह उन का भक्त बन उनकी शिक्षाओं का पालने करते लगता। फिर जो अपने को पात्र सिद्ध कर लेता उस का आकर्षण बना रहता अन्यथा वह छिद्रान्वेषी बन कर दूर होता जाता। ऐसे कई भक्त हैं जिन्हौने श्री महाराज  की सेवा की, भक्ति की, मन्दिर में सेवा की परन्तु फिर किसी छोटी सी बात पर उनमें प्रतिकर्षण आरम्भ हो गया और वे पीछे हट गए। इन में अधिकतर व्यक्तियों को बाद में पछतावा भी हुआ परन्तु वे पुनः सेवा में आने का साहस न कर सके।

श्री महाराज उपदेषों मात्र से शिक्षा नहीं देते थे। वे तो सभी भक्तों को एक पद्दति में डाल कर उन का उत्थान करते। यदि बीच में कहीं कोई भूल-चूक होती तो श्री महाराज अपना विक्राल रूप भी दिखा देते। ऐसे समय पर ही बहुधा श्री महाराज  से उपदेश स्वरूप ऐसे आदेश या निर्देश मिलते जिस से पता चले कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं। इस ढंग से भक्तों  का क्रियात्मक प्रशिक्षण होता।

श्री महाराज  सभी को एक ही लाठी से नहीं हांकते थे। वे तो व्यक्ति की प्रकृति, वृत्ति, विशेषता तथा सामर्थ्य देख कर उसी अनुसार उन्हैं आगे बढ़ाते। वह यह भी जानते थे कि आगे चल कर कौन सा व्यक्ति किस प्रकार का कार्य सम्भालेगा अतः उस की दीक्षा उसी के अनुरूप होती। श्री 'मां' को मुख्य रूप से उन का कार्य सम्भालना था अतः उन की साधना सबसे कढ़ी रही। अनवरत सेवा कार्य करवा कर, धरती सा सब कुछ सहने की क्षमता जगा कर 'श्री मां' में उन्होंने दैवी-ममत्व जागृत कर दिया जिस में त्याग, ममता, संचालन तथा शासन सभी की शक्ति है। इसी प्रकार श्री विवेक को जहां संगठन और व्यवस्था के लिए तैयार किया वहीं श्री कमाल का प्रशिक्षण सेवा, पूजा अर्चना तथा आन्तरिक व्यवस्था के लिए हुआ। अपने अन्य भक्तों को भी बे इसी प्रकार बिभिन्न कार्य सोंप कर उन्हैं उन्ही की क्षमता के अनुसार प्रशिक्षित करते रहे।

ऐसा बहुधा देखा है कि भक्त कि प्रकृति जांच कर वे एक भक्त को किसी कार्य से रोक देते तो दूसरे भक्त को उसकी छूट भी दे देते। और यदि एक ही भक्त में बे इतनी उन्नति पाते कि उसे पूर्व निषिद्ध कार्य से रोकने की आवश्यकता न रहे तो उसे उस में छूट भी देते। श्री मां का जब गहन प्रशिक्षण चल रहा था तो उन्हैं विभिन्न धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने की विशेष मनाही थी, जब की लेखक को वे इसके लिये उत्साहित करते रहते। आगे चल कर श्री मां पर से भी बन्धन हटा लिये गये थे।

श्री महाराज  भला भावी नागरिकों के प्रति कैसे उदासीन रह सकते थे। बे जानते थे कि आने बाली पिढ़ी को छुटपन से ही तैयार करना होगा। इसी लिए उन्होंने महादेवी तीर्थ में 'बाल आध्यात्मिक शिक्षा केन्द्र' की स्थापना की जिसका लाभ आज अनेक बालक-बालिकाएं उठा रहे हैं।

श्री महाराज  की लीलाओं तथा उनके द्वारा प्रचारित भावों के बारे में विचार करते ही श्री राम कृष्ण परमहंस की याद आ जाती है और मन के किसी कौने में प्रश्न उठता है कि परमहंस ने सौ साल बाद बायव्य दिशा में आने की जो बात की थी क्या वह यही तो चरितार्थ नहीं हुई?

संक्षिप्त परिचयप्रथम परिचय-कठिन साधना  |  गुप्त-भाव निरहंकारी  | सेवा भाव | परम-त्यागी तथा दानी | दया में फूल से कोमल शिक्षण में वज्र से कठोर | समदर्शी | सर्व-धर्म समन्वय | आत्म ज्ञानी | मातृ शक्ति का जागरण | सत्य-संकल्प तथा  देवी शक्ति का सहयोग | गरू भाव  | प्रथम अपने अवगुणों को देखो

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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