श्री महाराज सेवक दास

सत्य-संकल्प तथा  देवी शक्ति का सहयोग

श्री मां के साथ बाल क्रीड़ा करते देख ऐसा लगता था कि परमहंस स्पष्ट रूप में अपने बाल स्वभाव को प्रकट कर रहे हैं। श्री महाराज में परमहंस के सभी लक्षण दिखाई देते थे। जो उनके द्वारा किये गये सभी संक्लपों के सत्य होने तथा समय-समय पर दैवी शक्तियों के प्रकट सहयोग से पुष्ट होते हैं। उन का पहला ही संकल्प उनके सत्य संकल्प होने की ओर दृढ़ता से हमारा ध्यान खींचता है। और महादेवी तीर्थ का वर्तमान स्वरूप तो उनके अन्य बहुत से संकल्पों के सत्य होने का प्रमाण है ही। दैवी प्रेरणा से श्री महाराज ने भक्तों के सहयोग तथा निजी श्रम से गुफा का निर्माण कर लिया था।  श्री महादेवी की मूर्ति स्थापना के लिए 1965 की महाशिवरात्री का दिन भी निश्चित हो गया था। श्री महाराज के इस संकल्प को पुरा करने हेतू जनता सहयोग मिलने के साथ एक लाला जी ने मूर्ति लाने के लिए अपनी जीप तथा धन देने का भी बचन दिया था। परन्तु शिवरात्री से पांच छः दिन पहले उन लाला जी ने संदेश भिजवाया कि वे अपनी जीप नहीं भेज सकेंगे। तो श्री महाराज ने उसी समय कहा "महादेवी की स्थापना शिवरात्री को ही होगी अन्यथा यह बाबा इसी गुफा में उस दिन प्राण त्याग देगा। उस रात श्री महाराज बाहर से चिन्तामग्न दीखते हुए चट्टान पर वैठे रहे, वास्तव में ध्यान मग्न थे। लगभग आधी रात बीत चुकी थी जब एक जीप सढ़क पर आकर रूकी। जीप से एक महिला और एक पुरुष उतरे और सीढ़ियां , जो उस समय उबड़ खाबड़ रास्ता ही था, चढ़ कर गुफा के निकट श्री महाराज के पास पहुंचे।

स्त्री ने आते ही अपना सोने का कंगन श्री महाराज के चरणों में रख दिया और विनती की वे उसे प्रयोग में लाकर अपना संकल्प पुरा करें। अगले ही दिन जीप का प्रबन्ध हो गया। श्री महाराज दो तीन भक्तों को लेकर गए और शिवरात्री से पहले ही मूर्ति लेकर लौट आए। और धूम-धाम से शिवरात्री को मूर्ति-स्थापना की गई। उस महिला के रूप में आकर 'मां' ने श्री महाराज को आश्वस्त मात्र किया था, उन कंगनों का तो प्रयोग भी नहीं किया गया। ऐसी ही कई घटनाएं हैं जिनसे श्री महाराज के सत्य संकल्प होने तथा दैवी शक्तियों के उनके साथ होने के प्रमाण मिलते हैं।

अपने शरीर त्याग के बारे में भी श्री महाराज ने पहले ही संकल्प कर लिया था, 13 दिसम्बर 1975 को श्री महाराज ने श्री मां से कहा था 'बाबा बारह वर्ष तक तुम्हारे साथ साकार रूप में रहेगा, फिर निराकार रूप में।' और 13 दिसम्बर 1987 को श्री महाराज ने शरीर त्याग दिया।      

संक्षिप्त परिचयप्रथम परिचय-कठिन साधना  |  गुप्त-भाव निरहंकारी  | सेवा भाव | परम-त्यागी तथा दानी | दया में फूल से कोमल शिक्षण में वज्र से कठोर | समदर्शी | सर्व-धर्म समन्वय | आत्म ज्ञानी | मातृ शक्ति का जागरण | सत्य-संकल्प तथा  देवी शक्ति का सहयोग | गरू भाव  | प्रथम अपने अवगुणों को देखो        

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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