बाजरे की दो रोटियां

बाजरे की दो रोटियां

घटना सन् २००२ की है । मैं गांधी स्मारक निधि प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र पट्टीकल्याणा पानीपत में साधनारत रहते हुए स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रही थी ।यहां रहते हुए मुझे अनुभूति प्राप्त होती रहती है । आत्मानुभूति या ब्रह्यानुभूति ही मेरे जीवन का लक्ष्य है स्वभावतही मैं जहां जाती हूं वहां भगवद् भाव से ही वर्तती हूं । गुरू कृपा व शास्त्र विहित साधना द्वारा मेरी बुद्धि पूर्णरूपेण परिष्कृत हो चुकी है इसलिए मेरे मन के समस्त भेदभाव समान हो चुके हैं । मुझे सबमें एक प्रभु की प्रतीति होती है ।
प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र में मैं कुछ दिन तो फलाहार पर ही रही । तत्पश्चात दिन में एक समय अन्न ग्रहण करने लगी । केन्द्र के पिछले भाग में रह रहे एक दर्जी परिवार के घर अक्सर जाती थी । २५ जनवरी २००२ को प्रात९ बजे प्रैस करवाने के लिए कपड़े लेकर उस दर्जी के घर गई । घर पर उसकी पत्नी सईदा बेगम मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बना रही थी । मैंने पूछा ," सईदा ! तेरा घरवाला कहां गया है? इन कपड़ों पर प्रैस करानी थी । उत्तर दिया ," बिटिया को स्कूल छोड़ने गया है । कपड़े रख दो जब आएगा तो प्रैस कर देगा । मैंने पूछा," रोटियां बना रही हो ।" वह बोली ," हां । ये बाजार से बाजरा ले आए थे उसी की रोटियां बना रही हूं ।'' मैंने ध्यान से देखा कि बाजरे की रोटी भी मक्की की रोटी जैसे ही बनती है । बाजरा की रोटियां देखते ही मेरे मन में रोटियां खाने की इच्छा हुई जैसे ही मेरे मन में रोटियां खाने का संकल्प उठा वैसे ही मेरे अवचेतन मन में एक तरंग हिलोरे लेने लगी । मैंने जान लिया कि यह तो बचपन की तरंग है जो मेरे मन-मस्तिष्क में दबी पड़ी थी । तरंग ने आकर बुद्धि को झंझोड़ा । बुद्धि ने कहा - यह तो मुसलमान परिवार है । अछूत है । इनका धर्म तो अलग है । बुद्धि ने मुझे झंझोड़ते हुए कहा- तेरे पिता के घर में तो मुसलमानों व अछूतों को घर के आंगन में एक कोने में बिठाया जाता था । माता जी कहा करती थी कि मुसलमानों का धर्म अलग है । हिन्दू इनके घर का पकाया भोजन नहीं खाते । शादी -विवाह के अवसर पर मुसलमान हिन्दू के घर पर कच्चा अनाज भिजवाते थे लेकिन हमारे घरों में वे एक तरफ पंक्ति में बैठकर खाना खाते थे ।ये सभी बातें मुझे याद आने लगी । सन् १९४७ का हिन्दू - मुस्लिम झगड़ा भी स्मृति-पटल पर छा गया । अतीत की इन गहराईयों में डुबकी लगाकर जैसे ही बाहर निकली मुझे लगा कि नहीं सईदा एक इन्सान है, मानव है उसकी एक ही जाति है और वह है - मानव जाति । यह भी मेरे जैसी ही मातृस्वरूपा है । मेरे आराध्यदेव प्रत्येक नारी में 'मां' के ही दर्शन करते थे व दुर्गा महादेवी के स्वरूप हो देखकर मां भाव में ही रहते थे । गुरूकृपा से ही तो मैं नारी जाति के प्रति उच्चभाव से भावित हुई हूं । मानस-पटल पर एक लहर इधर से उठी और ऊधर की ओर निकल गई । रोटियां सेकते हुए सईदा ने कहा," माता जी ! आप खाएंगी ? मैंने कहा," हां । जरूर खाऊंगी । सईदा दो रोटियां ले आई । मैने अपनी चुन्नी का आंचल उसके आगे फैला दिया तो उसने हंसते हुए दो रोटियां मेरे आंचल में रख दी । मैं गर्म-गर्म रोटियों को अपने सीने से लगाए अपने कमरे में पहुंची और अपने साथिओं को बताया-" आज मैं जो भिक्षा लाई हूं उसमें से आप सबको भी हिस्सा मिलेगा ।" मैंने एक रोटी स्वयं खाई व एक के सात टुकड़े करके उन सब में बांट दी । रोटी खाते समय मुझे रोटी में मिठास का अनुभव हुआ- वह एक भाव था प्रेम का ।
२५ जनवरी २००२ का यह दिन मेरे लिए मानवता के भाव से ओत-प्रोत था । जीवन में मैंने पहली बार इस्लाम पंथी के घर का पका हुआ भोजन खाया था और यह दिन मेरे जीवन की अध्यात्म साधना का सर्वश्रेष्ठ दिन था । इसाई, बौद्ध, सिक्ख, जैन व हरिजन के घर मेम भोजन तो इससे पूर्व ही किया था । यह सब करते हुए मैंने अनुभव किया कि प्रेम मानवता का अलंकार है । मानव को मानवता का पालन-पोषण कर उसे जीवित रखना चाहिए ।
दूसरे दिन मैं कपड़े लेने फिर गई । उसके पति से बातचीत करते हुए पता चला कि इस आश्रम में रहते हैं इसलिए मांस नहीं खाते । मैंने कहा-" सुअर व गऊ में एक ही आत्मा होती है फिर क्यों धर्म के नाम पर हिंसा होती है ? अज्ञानता वश लोग यह भूल जाते हैं कि जीव हत्या घिनौना अपराध है और उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार होगा जैसा इन मूक प्राणियों के साथ करते हैं ।
मानवता के पौधे का बीज है- प्रेम । प्रेम रूपी बीज के बोने से ही मानवता का पौधा उगता है । उदारता व भाईचारे की भावना के जल से इस पोधे को सींचा जाता है और इस पौधे में सहनशीलता रूपी फूल खिलता है । विभिन्न धर्मों तथा पन्थों के प्रति उदार चेत्ता होकर उनमें एक ही भगवद् सत्ता के दर्शन करना ही इस मानवता रूपी पौधे का फल है । भगवान ही एक परम सत्ता है भगवान के द्वारा बनाया गया वो मानव ही महा मानव कहलाता है जो अध्यात्म पथ पर चलते हुए प्राणी मात्र को प्रेमपूर्वक अपनाते हुए अध्यात्म पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है ।
इन्हीं विचारों में कुछ क्षणों तक मैं खोई रही तथा अब तक बाजरे की रोटी भी खत्म हो चुकी थी और मेरा पेट भी भर गया था ।

 Even water, which has a natural tendency to flow downwards, is drawn up to the sky by the sun's rays. In the same way, God's grace lifts up the mind which has got a tendency to run after sense objects. Sharda Maa

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